एंटीबायोटिक का सेवन बढ़ा सकता है इस गंभीर रोग का खतरा, उम्र से पहले दिखने लगेगा बुढ़ापा

अगर आप एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल करते हैं, तो आपको सावधान हो जाने की आवश्यकता है, क्योंकि एक अध्ययन के अनुसार इन दवाओं और पार्किंसन बीमारी के बीच गहरा संबंध है।शोधकर्ताओं का कहना है कि इस बीमारी का संबंध आंत संबंधी लाभकारी जीवाणुओं के नष्ट होने से हो सकता है। फिनलैंड में हेल्सिंकी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों समेत शोधकर्ताओं ने 1998 से 2014 के दौरान राष्ट्रीय रजिस्ट्रियों में दर्ज पार्किंसन बीमारी के करीब 14,000 मरीजों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया। ‘मूवमेंट डिसॉर्डर्स पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया कि कुछ एंटीबायोटिक के अधिक इस्तेमाल से लोगों को पार्किंसन बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
पार्किंसन रोग क्या है-पार्किंसन रोग नर्वस सिस्टम में तेजी से फैलने वाला विकार है, जो आपकी एक्टिविटी को प्रभावित करता है। यह धीरे-धीरे विकसित होता है। यह रोग कई बार सिर्फ एक हाथ में होने वाली कम्पन के साथ शुरू होता है। लेकिन, जब कंपकपी पार्किंसन रोग का सबसे मुख्य संकेत बन जाती है तो यह विकार अकडऩ या स्लो एक्टिविटी का कारण भी बनता है।
पार्किंसन रोग के लक्षण-पार्किंसंस बीमारी शारीरिक गतिविधियों के विकारों की श्रेणी में आता है, जिसमें दिमागी कोशिकाएं बननी बंद हो जाती हैं। शुरुआती सालों में इसके लक्षण काफी धीमे होते हैं, जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। इसके चार मुख्य लक्षण हैं। इसमें हाथ, बाजू, टांगों, मुंह और चेहरे में कंपकपाहट होना, जोडों या धड़ में कठोरता आना, हरकतों में धीमापन और सुंतलन व तालमेल बिगडऩा शामिल हैं। शुरू में रोगी को चलने, बात करने और दूसरे छोटे-छोटे काम करने में दिक्कत महसूस होती है।
इलाज पर ध्यान दें- युवाओं की पहली प्रतिक्रिया होती है कि उनकी जिंदगी खत्म हो गई है। ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि लोगों को इस बीमारी की जानकारी हो और इलाज के विकल्पों के बारे में भी। इस बीमारी का निदान ढूंढऩा काफी मुश्किल है, क्योंकि इसकी कोई भी ऐसी जांच नहीं है। आमतौर पर डॉक्टर इसके लक्षण और रोगी की हालत देखकर ही इस रोग के बारे में बताते है।
सर्जरी के विकल्प-भारत में पार्किंसंस रोगियों के लिए सर्जरी के कई विकल्प हैं। प्रारम्भ में रोगी को ऐसे हॉस्पिटल में जाना चाहिए, जिसमें पार्किंसंस बीमारी के इलाज के लिए न्यूरोलोजिस्ट की विशेष टीम हो, जो मूवमेंट डिसआर्डर देखती हो और ब्रेन सर्जन (फंक्शनल न्यूरोसर्जन), जिन्हें इस तरह की सर्जरी करने का काफी अनुभव हो।
एव्टिवा सिस्टम-एव्टिवा सिस्टम में तीन घटकों को प्रत्यारोपित किया जाता है, जिसमें लीड, एक्सटेंशन और न्यूरो स्टेमुलेटर प्रमुख है। लीड एक पतली इंसुलेटिड तार है, जिसकी नोक पर चार इलेक्ट्रोड होते हैं, उसे दिमाग में प्रत्योरोपित किया जाता है। एक्सटेंशन न्यूरो-स्टेमुलेटर से जुड़ है, जो एक छोटा सीलबंद डिवाइस है। ये बैटरी की सहायता से 3 से 5 साल तक चलती है। न्यूरो स्टेमुलेटर छाती की त्वचा पर लगाया जाता है।नई टेक्नोलॉजी में न्यूरो स्टेमुलेटर काफी एडवांस है। ये स्टेम्युलेशन के लिए पल्सेस उत्पन्न करता है। शोधकर्ताओं ने ये भी पाया है कि इलेव्टिक पल्सेस दिमाग के असामान्य संकेतों को ब्लॉक कर देते है, जो पार्किंसंस बीमारी के लक्षणों का कारण है। दिमाग के किसी खास हिस्से में बिजली की तरंगों से स्टेमुलेशन करके गतिविधियों को प्रभावित करता है। विद्युत तरंगें इलेक्ट्रोड तार द्वारा उत्पन्न करके उसे दिमाग में सर्जरी से स्थापित किया जाता है। दवाएं लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक नहीं होतीं तो डीप ब्रेन स्टेमुलेशन को किसी ड्रग या लेवोडोपा के साथ इस्तेमाल किया जाता है।
पेलिडोटोमाई-पेलिडोटोमाई तकनीक में दिमाग के बहुत गहरे हिस्से (ग्लोबस पेलिडस) के छोटे से हिस्से को नष्ट किया जाता है।
थेलामोटोमाई-थेलामोटोमाई तकनीक में दिमाग के बहुत गहरे हिस्से (थेलामस) के छोटे से हिस्से को नष्ट किया जाता है।
न्यूरोट्रांसप्लान्टेशन-यह प्रयोगात्मक प्रक्रिया है, जिसमें पार्किंसंस बीमारी के इलाज पर अध्ययन किया जा रहा है। इसमें कोशिकाओं को ट्रांसप्लांट किया जाता है जो दिमाग में डोपामाइन को बढ़ाते है।
ऐसी नौबत न आने दें-अक्सर ऐसा देखने में आता है कि रोगी इस बीमारी के होने पर शर्मिंदगी महसूस करते हैं और अपनी समस्या लोगों से छिपाते रहते हैं। वे सोचते हैं कि दवाओं से ही ठीक हो जाएगा, लेकिन जब दवाएं काम करना बंद कर देती हैं तो रोगी के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचता है। इसके इलाज में सर्जरी के बाद दवाएं तो कम हो ही जाती हैं, दवाओं के दुष्परिणाम भी कम हो जाते हैं। डॉ. गुप्ता के अनुसार, ज्यादातर डोपामाइन दवाएं मरीज को 5 से 7 साल तक आराम दे पाती हैं। इसके बाद तीस या 40 की उम्र के इन युवाओं के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचता है, क्योंकि इस दौरान उन्हें सक्रिय जिंदगी जीने की जरूरत होती है।

 

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