एमएसपी से नीचे बिक रहे अरहर चने का भाव और गिरेगा!

 

पुणे । अरहर और चना का भाव सरकार के तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 10-15 प्रतिशत नीचे चल रहा है। इसमें आगे और गिरावट की आशंका है क्योंकि नई फसल कटने के साथ आवक रफ्तार पकड़ रही है। व्यापार जगत के मुताबिक, अब पूरा दारोमदार सरकार पर है। वह अरहर और चना की ज्यादा खरीदारी करेगी, तभी कीमतों में गिरावट का सिलसिला रुकेगा। एक ओर, पिछले साल के अनियमित मॉनसून के चलते उड़द की पैदावार पर बुरा असर पड़ा था। इसका खुदरा भाव 100 रुपये किलो के पार हो गया है। इसे काबू में करने के लिए सरकार 4 लाख टन उड़द आयात कर चुकी है। दूसरी ओर, अरहर और चना जैसी दालों में मंदी दिख रही है जिनकी बाजार में आवक बढ़ रही है। मॉनसून के बाद लंबी बारिश से अरहर और चना की कटाई में 3 से 4 हफ्ते की देरी हुई है। हालांकि, इसका आपूर्ति पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि केंद्र सरकार के पास काफी स्टॉक था। फिलहाल, महाराष्ट्र के लातूर मार्केट में साबुत अरहर का दाम 48-49 रुपये किलो है, जबकि एमएसपी 58 रुपये किलो है। लातूर में दालों की प्रोसेसिंग करने वाले नितिन कलंत्री ने बताया, ‘यह कुछ नमी वाली अरहर का दाम है। अच्छी क्वॉलिटी का भाव 51 रुपये किलो है। एक फरवरी से आवक का दबाव बढऩे की आशंका है। इससे दाम 2-3 रुपये प्रति किलो और गिर सकते हैं।Ó कारोबारियों को महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और अन्य दक्षिणी राज्यों में प्रति एकड़ उपज बढऩे की उम्मीद है। वहीं मध्य प्रदेश में नवंबर की बारिश से फसल को नुकसान हुआ था। इससे पैदावार घटने की आशंका है। कर्नाटक सरकार अरहर खरीद के लिए तैयार है। इसने केंद्र सरकार की तय एमएसपी पर 300 रुपये प्रति क्विंटल सब्सिडी ऐलान किया है। महाराष्ट्र सरकार ने भी किसानों को रजिस्टर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अरहर की तरह चना किसानों को भी एमएसपी के मुताबिक दाम मिलने में मुश्किल हो सकती है क्योंकि अगले महीने से शुरू होने वाले कटाई सत्र में बंपर पैदावार का अनुमान है। चने की 105.35 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई है, जो इससे पिछले साल के मुकाबले तकरीबन 10 प्रतिशत ज्यादा है। रबी दलहन की 15 जनवरी तक 157.33 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी। चने की एमएसपी 48.75 रुपये किलो है, जबकि यह 36-37 रुपये किलो में बिक रहा है। व्यापार जगत का सुझाव है कि एमएसपी पर खरीदारी के साथ सरकार को कटाई के समय अपने स्टॉक को मार्केट में उतारने से बचना चाहिए। नितिन ने कहा, ‘हमने पिछले कुछ हफ्तों में नेफेड (नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन) की ओर से आक्रामक बिक्री देखी है। इससे दलहन के भाव पर दबाव और भी ज्यादा बढ़ सकता है।

 

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