डूबे कर्ज पर सरकारी बैंकों को नहीं मिलेगा बैड बैंक का सहारा!

नई दिल्ली। सरकार ने सरकारी बैंकों के डूबे हुए कर्ज का मामला संभालने के लिए बैड बैंक बनाने का आइडिया खारिज कर दिया है। वह इसके लिए एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी बनाने के प्रस्ताव पर भी उत्साहित नहीं है। दरअसल सरकार नहीं चाहती है कि बैड लोन का मामला सुलझाने के लिए टैक्सपेयर्स का और पैसा इन तरीकों में लगाया जाए। एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने इकनॉमिक टाइम्स से बताया कि इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के तहत रिजॉलूशन प्रोसेस से बैड लोन के कहीं ज्यादा बड़े मामलों को निपटाया जा सकता है और देश में पहले ही कई एआरसी काम कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘लोन डिफॉल्ट के बड़े मामले आईबीसी के तहत रिजॉलूशन प्रोसेस में हैं। अपेक्षाकृत छोटे एनपीए के लिए एक बैड बैंक बनाने की कोई तुक नहीं है क्योंकि उनसे कुछ खास वैल्यू हासिल नहीं हो सकेगी।सरकारी बैंकों ने एक एआरसी बनाने का सुझाव दिया था और इसमें नैशनल इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट फंड से मदद लेने पर जोर दे रहे थे। उसके बाद बैड बैंक का आइडिया दोबारा सामने आया। अधिकारी ने कहा कि टैक्सपेयर्स के पैसे से बैंकों में पहले ही रकम डाली जा रही है और बैड बैंक में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पैसा लगाना ही पड़ेगा और सरकार ऐसा नहीं करना चाहती है। बैड बैंक का मतलब सरकारी फंडिंग वाली ऐसी संस्था से है, जो बैंकों का समूचा बैड लोन खरीदे। इस आइडिया पर कुछ समय से विचार हो रहा है, लेकिन फाइनैंस मिनिस्ट्री इसको लेकर उत्साहित नहीं है। आइडिया यह है कि बैड बैंक बनाने से लेंडर्स को अपना बही-खाता बैड लोन से मुक्त करने का मौका मिलेगा, जिससे क्रेडिट ग्रोथ तेज होगी। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इससे पहले साफ किया था कि सरकार इसके पक्ष में नहीं है कि केवल बजट के सपोर्ट से बैड लोन रिजॉल्यूशन हो। 2016-17 के इकनॉमिक सर्वे में पब्लिक सेक्टर एसेट रीहैबिलिटेशन एजेंसी का सुझाव दिया गया था और कहा गया था कि प्राइवेट सेक्टर की एआरसी बैड लोन का समाधान निकालने में सफल नहीं रही हैं। इसके अलावा नैशनल एसेट मैनेजमेंट कंपनी बनाने पर भी विचार किया गया था, जो बैड लोन का मसला सुलझाने के लिए नोडल एजेंसी के रूप में काम करती।

 

 

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