मैंने फ्लॉप फिल्मों से अपना करियर बनाया है मनोज बाजपेयी

बॉलिवुड के सशक्त अभिनेता मनोज बाजपेयी ने हमेशा लीक से हटकर फिल्में चुनी हैं। ‘सत्या’ के भीखू महात्रे के किरदार से चर्चा में आए मनोज ने अपने फिल्मी करियर में इक्का-दुक्का ही कमर्शल फिल्में की हैं। इन दिनों मनोज सत्यमेव जयते’ को लेकर चर्चा में हैं। फिल्मों और इंडस्ट्री में हो रहे बदलाव पर मनोज ने हमसे दिल खोलकर बातें कीं लंबे समय के बाद कमर्शल फिल्म कर रहे ऐक्टर मनोज बाजपेयी बताते हैं, मैंने सत्यमेव जयते निखिल से दोस्ती की वजह से की। मैं और निखिल आडवाणी (प्रड्यूसर) एक दूसरे के बेहद करीब हैं। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता हूं। सभी जानते हैं कि मैं ज्यादातर कमर्शल फिल्में नहीं करता, लेकिन दोस्ती की वजह से मैंने हामी भर दी। वैसे फिल्म की कहानी बहुत ही दमदार है। एक मसाला फिल्म में जितने सारे एलिमेंट्स होते हैं, वे सभी देखने को मिलेंगे। मिलाप जावेरी ने बहुत अच्छी कहानी लिखी है। मैंने इस तरह की फिल्मों में जितने दिन भी काम किया बहुत अच्छे से काम किया। लोगों ने मेरा बहुत ख्याल रखा मेरा एक्सपीरियंस बहुत ही मजेदार रहा।
भारत का हर नागरिक झेलता है करप्शन
हमारे हिंदुस्तान में ऐसा कौन सा नागरिक है, जो करप्शन का शिकार न बना हो। लेकिन आप उससे डील कैसे करते हैं यहां आप पर निर्भर करता है। मैंने कभी करप्शन को बढ़ावा नहीं दिया है। साथ ही मैं आपके पाठकों से भी निवेदन करूंगा कि वे करप्शन को बढ़ावा ना दें। जब कभी वह ट्रैफिक में फंसें तो बजाय ट्रैफिक पुलिसवाले की पॉकेट भरने के उन्हें फाइन दें। यह छोटी-छोटी चीजें लोग करने लगे तो हालात बदल सकते हैं। अगर प्लास्टिक बैन हुआ है तो प्लास्टिक का यूज नहीं करना हमारा कर्तव्य है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम पर्यावरण को बेहतर बनाने में मदद करें। कहीं ना कहीं हमें जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निभाना पड़ेगा।
इस समय के लिए बहुत मेहनत की
इंडस्ट्री में हम जैसे ऐक्टर्स के लिए बहुत बढिय़ा समय चल रहा है। इस समय के लिए हमने एक लंबी लड़ाई है। कई लोगों का योगदान रहा है। मैंने भी अपने लेवल पर इसके लिए बहुत मेहनत की है। ऐसा भी समय था जब इंडस्ट्री में हमें घुसने तक नहीं दिया जाता था। हमारे लिए रोल नहीं हुआ करते थे। हमें तो हीरो का भाई या दोस्त भी नहीं बना सकते थे। आज इतना संघर्ष कर हम यहां तक पहुंचे हैं, ऐसे बहुत सारे ऐक्टर्स हैं जो बहुत नाम कमा रहे हैं, उनकी तारीफ हो रही है, बहुत सारी अच्छी-अच्छी फिल्में कर रहे हैं। वे सब हम जैसे एक्टर्स अब स्टार्स के बराबर आकर खड़े हो गए हैं। आज जो यह समय है, इसके पीछे बहुत जद्दोजहद रही है। मैं इसका क्रेडिट गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल, राम गोपाल वर्मा, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, मणिरत्नम को देना चाहूंगा। वहीं आज की ब्रिगेड में अनुराग कश्यप, नीरज पांडे जैसे नाम हैं जिन्होंने इसका बीड़ा उठाया है।
सरकार हमारी इंडस्ट्री पर ध्यान नहीं देती
लो बजट की फिल्में अक्सर दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती है। जिन फिल्मों को बड़े प्रॉडक्शन हाउस का बैनर मिल जाता है वह दर्शकों तक पहुंच जाती है। वहीं कुछ ऐसी फिल्म भी है जो रिलीज को तरसती हैं। इसके कई सारे कारण है। एक तो स्क्रीन की कमी वहीं दूसरी ओर कमर्शल फिल्ममेकर्स, एग्जिबिटर्स का एकाधिकार इन फिल्मों को रिलीज होने से रोकता है। इसके लिए सरकार को नई पॉलिसी लाने की जरूरत है। लेकिन हमारी सरकार इसपर ध्यान नहीं देती। शायद इसलिए कि हमारी इंडस्ट्री उनका वोट बैंक नहीं है। आजादी के बाद से ही इंडस्ट्री को दरकिनार किया गया है क्योंकि हम उन्हें इलेक्शन जीतने में कोई मदद नहीं करते। हमारा काम तो सरकार को मोटे-मोटे टैक्स भरना है।

‘सत्या’ ने सबकी जिंदगी बदल दी
भीखू म्हात्रे के किरदार ने न केवल मुझे नाम दिया बल्कि लोगों के दिलों में पहचान बनाई है। मैं तो कहूंगा इसका योगदान केवल मेरे जीवन में नहीं रहा बल्कि इस फिल्म ने कई सारे फिल्ममेकर्स और लोगों की जिंदगी को बदला है। मैं बहुत ही भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे इस तरह का किरदार निभाने का मौका मिला। मैंने जिंदगी में कुछ ऐसे किरदार निभाए हैं जिनपर बहुत गर्व महसूस करता हूं। ‘शूल’, ‘सत्या’, ‘पिंजर’, ‘राजनीति’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में मेरे किरदारों ने इंडस्ट्री को इंस्पायर किया है।

स्टार कल्चर अब होगा खत्म
आने वाले समय में स्टार पावर वाला कल्चर धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। एक हफ्ते में केवल 3 दिन ही फिल्में चलती हैं, जिस वजह से दर्शकों पर स्टार अपना होल्ड ज्यादा नहीं रख पाते हैं। वहीं अब स्टार्स पहले की तरह मिस्टीरियस नहीं रहे। अब हर जगह नजर आने लगे हैं। पहले स्टार पावर एक मिस्ट्री हुआ करती थी कि एक स्टार कैसे चलता होगा? लोगों से कैसे मिलता होगा? आम जीवन में कैसे बात करता होगा? दूसरी ओर डिजिटल प्लैटफॉर्म के आ जाने पर चीजें और भी ऐक्सेसिबल हो गई हैं। अब स्टारडम अलग तरीके का होगा। डायरेक्टर्स अब पावरफुल होते जाएंगे। मैंने राम गोपाल वर्मा के साथ बहुत काम किया है! उन जैसा रेस्टलेस और जीनियस इंसान मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा। वह मुझे जब-जब बुलाएंगे मैं तब तब उनके साथ काम करता रहूंगा।
फ्लॉप फिल्मों के दम पर करियर बनाया
मैंने इंडस्ट्री में कुछ खोया नहीं है। एक गांव के मिडिल क्लास फैमिली के लड़के को इतना प्यार और सम्मान मिला है इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। मैं हर बात पर कंप्लेन नहीं करता हूं। पर मेरी खोज कभी खत्म नहीं होती है। हर फिल्म के बाद मुझे अपना काम पसंद नहीं आता है। मैं कोई भी शॉट देख लूं तो मुझे कोफ्त होने लगती है। मैं ख़ुद का सबसे बड़ा क्रिटिक हूं। मैं फिल्मों की कमर्शल सक्सेस पर कभी ध्यान नहीं देता हूं। अगर ऐसा होता तो मैंने ‘सत्या’ के बाद बहुत सी बड़ी बजट की फि़ल्में कर ली होती लेकिन मैंने शूल, पिंजर, कौन और ज़ुबैदा जैसी फिल्में कीं। अगर मैं उन फिल्मों को तवज्जो देता तो मेरा भी बंगला और बड़ा बैंक बैलेंस होता। मैं गर्व से कहता है कि मैंने अपना करियर फ्लॉप फि़ल्मों के बलबूते पर बनाया है।

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *