भारतीय रेल का ‘बुलेट युग में प्रवेश

भारत अब दुनिया के उन 15 देशों में शुमार होने की राह पर आ गया है, जहां बुलेट ट्रेन चल रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबी के 14 सितंबर को बहु-प्रतीक्षित अहमदाबाद-मुंबई हाईस्पीड रेल परियोजना की आधारशिला रखने के साथ बुलेट ट्रेन पर जमीनी काम जल्दी शुरू हो जाएगा। रेल मंत्रलय की योजना है कि यह परियोजना 15 अगस्त, 2022 तक साकार हो जाए। इस परियोजना पर एक लाख आठ हजार करोड़ रुपये की लागत आएगी। 1बहरहाल, अभी तक दुनिया के प्रमुख देशों में भारत ही ऐसा रहा है, जिसके पास एक भी हाईस्पीड कॉरिडोर नहीं था। मगर जापान की मदद से यह साकार होगा। पहले रूसी मदद से कोलकाता में मेट्रो रेल आई थी और अब दूसरी उससे भी अहम परियोजना यह होगी। कोरिया,जापान और चीन में गाडिय़ां 350 किमी तक की गति से चल रही हैं। वहीं भारत में हमारी परंपरागत तकनीक की रेल गाडिय़ों की सीमित रफ्तार है। भारत में बड़ी लाइन की एक्सप्रेस गाडिय़ों की औसत रफ्तार 50 किमी प्रति घंटा है, जबकि ईएमयू 40 और पैसेंजर की 36 किमी से कुछ ज्यादा है। वहीं मालगाड़ी की रफ्तार 25 किमी से कम है। आज भी हमारी सबसे तेज रफ्तार गाड़ी गतिमान एक्सप्रेस 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दिल्ली से आगरा के बीच चल रही है। इसी खंड पर 2005 में 150 किमी की गति तय हुई थी। तमाम मौकों पर गति बढ़ाने की बात हुई, लेकिन कुछ रेल दुर्घटनाओं के नाते रेलवे फैसला नहीं ले पाई। माधव राव सिंधिया, सी.के. जाफर शरीफ, लालू प्रसाद, दिनेश त्रिवेदी और सुरेश प्रभु ने तेज रफ्तार की दिशा में कुछ काम किया, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। अब पहली बार इस दिशा में कुछ ठोस नीतिगत फैसला लिया गया है।1भारतीय रेल 17 क्षेत्रीय रेलों और 68 मंडलों के प्रशासनिक ताने बाने और करीब 66 हजार किमी रेलमार्ग के सहारे देश का सबसे बड़ा नियोजक भी है। रोज यह करीब ढाई करोड़ मुसाफिरों यानी ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी के बराबर लोगों को गंतव्य तक पहुंचाती है। इसकी 19 हजार से अधिक रेलगाडियों में 7421 मालगाडिय़ां और बाकी यात्री गाडिय़ां हैं। वैसे तो तेज रफ्तार गाड़ी पर काफी दिनों से विचार चल रहा था, लेकिन वह अध्ययनों से आगे नहीं बढ़ पाया। ममता बनर्जी ने अपने रेलमंत्री काल में 2010 में विजन-2020 में 160 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा की गाडिय़ां चलाने की परिकल्पना के साथ 250-350 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार वाली बुलेट ट्रेनों की बात कही थी। इसी विचार को आगे बढ़ाने के लिए 2012 में राष्ट्रीय उच्च गति प्राधिकरण बनाने का फैसला हुआ, लेकिन किसी गलियारे को मंजूरी नहीं मिल पाई। जबकि दुनिया में इस समय 40 हजार किमी तीव्र गति के गलियारे बन रहे हैं। दुनिया में जापान, ऑस्टिया, बेल्जियम, चीन, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, ताइवान, तुर्की, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में बुलेट ट्रेन चलती है, लेकिन सबसे ज्यादा हाई स्पीड नेटवर्क चीन के पास है जो करीब 22 हजार किमी लंबा हो गया है। अब भारतीय रेल भी इन देशों की सूची में शामिल होने की ओर अग्रसर है। भारतीय बुलेट ट्रेन का 92 फीसदी हिस्सा इलेवेटेड होगा जबकि छह फीसद सुंरंग होगी। इस बुलेट ट्रेन परियोजना में जापान 88 हजार करोड़ रुपये का कर्ज दे रहा है। जापान का चयन पहले ही इस नाते किया गया था क्योंकि यह बुलेट ट्रेन के मामले में अग्रणी रहा है और पांच दशकों में दुर्घटना रहित संचालन का इसका शानदार रिकार्ड रहा है।1हमारी बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए वडोदरा में एक हाईस्पीड रेल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट भी बनाया जा रहा है,जो जरूरी चार हजार कर्मचारियों को प्रशिक्षित करेगा। यह 2020 तक पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा। इससे भविष्य के लिए भारत में हाईस्पीड तकनीक के लिए प्रतिभाओं को निखारा जा सकेगा। अभी तक भारतीय रेल के करीब तीन सौ कर्मचारियों को जापान में प्रशिक्षण दिया गया है। इस परियोजना पर भारत की सबसे लंबी 21 किलोमीटर की सुरंग भी बनेगी, जिसका सात किमी हिस्सा पानी में होगा। परियोजना के निर्माण के दौरान 20 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। इस परियोजना के कई जमीनी कामों और औपचारिकताओं को पहले ही पूरा किया जा चुका है और जरूरी नियुक्तियां की जा चुकी हैं। इस परियोजना में रेल मंत्रलय के साथ गुजरात और महाराष्ट्र सरकार भी क्रियान्वयन में सहयोग देगी। परियोजना को लेकर पहले से ही जापान से कई बार संवाद हो चुका है। संप्रग शासन के दौरान ही इस पर संवाद की शुरुआत हुई थी, लेकिन तब ब्याज दरें और राशि कम थी और शर्ते भी कठोर। मगर राजग सरकार की कोशिशों से 80 फीसदी व्यय जापान वहन करने को राजी हुआ। वैसे तो 2011 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय तीव्र गति रेल प्राधिकरण की स्थापना करने का फैसला किया था और 350-350 किमी प्रति घंटे की गति के छह गलियारों का पूर्व व्यवहार्यता अध्ययन कराने का भी फैसला किया। इसमें दिल्ली-चंडीगढ अमृतसर(450 किमी), पुणो- मुंबई- अहमदाबाद (650 किमी), हैदराबाद,विजयवाड़ा, चेन्नई (664 किमी), चेन्नई-बेंगलुरु-कोयबंटूर-एरनाकुलम-तिरुवनंतपुरम (850 किमी) और हावड़ा हल्दिया (135 किमी) के साथ दिल्ली-आगरा-लखनऊ-वाराणसी-पटना (991 किमी) शामिल था। इन कामों से भारतीय रेल का भरोसा बढ़ा है। इस परियोजना के लिए पहले जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी (जीका) ने आर्थिक और वित्तीय विश्लेषण के साथ जो व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की थी उसमें परियोजना पर करीब 97,636 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान लगाया था। 2023 तक करीब 40 हजार यात्री रोज बुलेट ट्रेन सेवा का उपयोग करने लगेंगे। इससे उनकी यात्र का समय मौजूदा सात घंटे से घट कर करीब दो घंटे हो जाएगा। मुंबई अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना जापान की शिन्कान्सेन तकनीक पर आधारित है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते के मुताबिक मुंबई स्टेशन बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लैक्स में बनाया जाएगा। इस तरफ का मुख्य स्टेशन अहमदाबाद होगा, जबकि साबरमती में गाड़ी का यार्ड बनाया जाएगा। मुंबई -अहमदाबाद के बीच कुल एक दर्जन स्टेशन बनेंगे मुंबई, ठाणो, विरार और भोईसर महाराष्ट्र में होगा, जबकि वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आणंद, अहमदाबाद और साबरमती गुजरात में पड़ेगा। गाड़ी अगर सभी स्टेशनों पर रुकी तो भी दो घंटा 58 मिनट में यात्र पूरी कर लेगी। अच्छी बात है कि सरकार ने 15 अगस्त, 2022 से बुलेट ट्रेन चलाने की घोषणा की है। इससे भारतीयों में बुलेट ट्रेन से लैस देश का नागरिक होने का अभास जरूर होगा, लेकिन रेल गाडिय़ों के बेपटरी होने और देश की गरीब जनता की जेब से बाहर होती ट्रेन यात्र की स्थिति बताती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता को ऐसे सपने दिखा रहे हैं जैसे वह स्वर्ग में सीढ़ी लगाने जा रहे हैं। रेल मंत्रलय के कुप्रबंधन का स्तर यह है कि पैसेंजर ट्रेन से लेकर राजधानी तक कब बेपटरी हो जाए किसी को पता नहीं। यात्रियों की सुरक्षा की गारंटी लेने वाला कोई नहीं है। इतनी दुर्घटनाओं और यात्रियों की मौत के बावजूद तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इस्तीफा देने की जरूरत नहीं समझी। हालांकि कैफियात ट्रेन हादसे के बाद उन्होंने इस्तीफा देने का प्रस्ताव जरूर रखा, लेकिन प्रधानमंत्री ने इसे स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। 1यह घटनाक्रम बताता है कि राजग सरकार बहुमत के चलते अहंकार से भर गई है जहां उसे जनता के सुरक्षा की परवाह तक नहीं रही। रेल हादसों का सिलसिला इस तरह अंतहीन सिलसिला में तब्दील हो चुका है कि लोग ट्रेन यात्र को लेकर हमेशा भयभीत रहने लगे हैं कि कहीं उनकी रेगगाड़ी भी बेपटरी न हो जाए। रेलवे प्रबंधन इतना अमानवीय है कि यात्रियों से उनके मंगलमय और शुभ यात्र का पूरा किराया पहले ही वसूल लेता है, लेकिन सुखद यात्र के नाम पर उन्हें दुखद यात्र के लिए छोड़ देता है। रेलमपेल भीड़ में धक्का-मुक्की करके लोग जैसे-तैसे ट्रेन पर चढ़ तो जाते हैं, लेकिन इनमें से कई लोगों को टॉयलेट में बैठकर सफर करना पड़ता है। 1भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने 80 ट्रेनों और 74 रेलवे स्टेशनों पर किए गए एक सर्वे की रिपोर्ट विगत जुलाई में संसद में प्रस्तुत की थी। इसका सार यह है कि रेलगाडिय़ों और रेलवे स्टेशनों पर बिक रही चीजें खाने-पीने लायक नहीं हैं। इस रिपोर्ट में आगे लिखा गया है कि ट्रेनों और स्टेशनों पर साफ-सफाई का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा जाता है। कूड़ेदानों को न तो ढक कर रखा जाता है और न ही इनकी नियमित सफाई होती है। बोगियों और स्टेशनों की सफाई के लिए निजी कंपनियों को लगाया गया है। फिर भी साफ सफाई की बदतर स्थिति यथावत बनी हुई है। इन तमाम बदइंतजामों के बीच भी बुलेट ट्रेन चलाई जा सकती है क्या? हां चलाई जा सकती हैं, क्योंकि भारत के लोग बहुत ही सहनशील हैं। ये लोग सरकार से कभी प्रश्न करने का साहस नहीं कर पाते। मगर इस बुलेट ट्रेन में यात्रियों का जीवन कितना सुरक्षित रहेगा? इसकी कोई जीवन बीमा नीति सरकार और रेल मंत्रलय के पास नहीं है? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो बताता है कि 2014 में रेल दुर्घटनाओं में मारे गए लगभग 28,000 लोगों में से करीब 18,000 ट्रेन के बेपटरी होने की वजह से मारे गए थे। अप्रैल 2014 में देश में 11,000 से ज्यादा ऐसे क्रॉसिंग थे जिन पर फुट ओवरब्रिज और सब-वे बनाने की योजना अधर में लटकी हुई है। इसका कारण पैसे की कमी बताई गई। वहीं किराये के मामले में जनता ठगी हुई महसूस कर रही है। 1853 से अब तक पहले दर्जे का किराया 2 रुपये 10 आने, दूसरे दर्जे का किराया एक रुपये 1 आना और तीसरे दर्जे का किराया 5 आना 3 पैसा से बढ़कर हवाई जहाज के किराये के बराबर हो गया है। जब लालू प्रसाद रेल मंत्री थे, तब रेल बजट में काफी मुनाफा दिखाया गया था। मगर जानकारों का कहना है कि रेल मंत्रलय के पास आधुनिकीकरणके लिए पर्याप्त बजट नहीं है, लेकिन तुर्रा देखिए मोदी सरकार बुलेट ट्रेन चलाने जा रही है। 1बुलेट ट्रेन की आधारशिला रखने के लिए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबी को आमंत्रित करना और अहमदाबाद में रोड शो करना मोदी के राजनीतिक मंसूबे को उजागर करता है। कुछ ही दिनों में गुजरात विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कहा जा रहा है कि जापान के प्रधानमंत्री के साथ रोड शो गुजरात चुनाव के मद्देनजर ही किया गया। अगर यह सही है तो इस रोड शो में इतना खर्च क्यों किया गया,जबकि सरकार के पास रेलवे का बुनियादी ढांचे के लिए बजट नहीं है। यह स्थिति सरकार के इरादे को संदिग्ध बनाती है।

 

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