बच्चों पर बार-बार करती हैं गुस्सा जानें पेरेंटिंग का सही तरीका यहां

आइसक्रीम में पिघलेगा पछतावा बिटिया ने सुबह स्कूल जाते हुए छुट्टी करने की इतनी जिद कर डाली थी कि पूजा का खुद पर कंट्रोल ही नहीं रहा। पहले उसको बहुत डांटा और फिर चपत भी लगा दी। पूजा को अपनी इस हरकत या कहें पछतावे का अंदाजा बिटिया के स्कूल जाने के बाद हुआ। पर, अब पूजा के पास एक बढिय़ा आइडिया था। बिटिया स्कूल से आई तो वो सुबह वाली बात भूल गयी थी, पर पूजा ने फिर भी उसे आइसक्रीम खिलाने का ऑफर दे डाला। अब बिटिया ने जब आइसक्रीम हाथ में ली, तब पूजा ने उसे प्यार से सुबह गुस्सा होने का कारण समझा दिया। क्लीनिकल साइकोलॉजस्टि डॉ. आराधना गुप्ता कहती हैं कि पूजा ने जो किया यही सही तरीका है। बच्चे के साथ की गई गलती का पछतावा हो तो उससे बात तब करें जब बच्चा अच्छे और रिलैक्स मूड में हो। यकीन मानिए तब वो आपकी बात भी सुनेगा और काफी हद तक उस पर अमल भी करेगा।खुद पर हो नजर बच्चे के साथ किये व्यवहार का पछतावा नहीं करना है तो सबसे अच्छा होगा कि आप खुद पर नजर रखें। गुस्सा आने पर भी आप गुस्से पर नियंत्रण कर पा रही हैं या नहीं, आपको देखना होगा। मनोविशेषज्ञ डॉ. स्मिता श्रीवास्तव कहती हैं, ‘गुस्सा आना आपकी समस्या है, बच्चे की नहीं। चिल्लाने से अच्छा होगा कि बच्चे को उसकी गलती शांति से समझाया जाए। चिल्लाने से बच्चा शायद डर जाए, नहीं डरेगा तो शायद इस बात को थोड़ी देर में भूल भी जाएगा। याद रखें कि आपका कुछ देर बैठ कर उन्हें समझाना नश्चिति ही बच्चे का आत्मवश्विास बढ़ाएगा। बच्चे के स्वभाव में सुधार लाने के लिए आपको उसे ज्यादा समय भी देना शुरू करना होगा।इस रिश्ते में भी करें निवेश डॉ. आराधना मानती हैं कि आपसी जुड़ाव की भाषा बच्चे दो साल की उम्र से समझने लगते हैं। छुटपन से ही बच्चे के साथ अपने रश्तिे को बेहतर बनाने की कोशिश शुरू कर दें। वो एक उदाहरण देती हैं, ह्यमेरे पास एक बार एक मां-बेटे आए थे। बच्चे के रोने पर मां उसे मेरे सामने ही पीटने लगी थीं और ऐसा करते हुए खुद रोने भी लगीं कि बच्चा कुछ सुनता नहीं। इस वजह से मैं भी परेशान रहती हूं। मैंने उन्हें धीरे-धीरे बेटे का वश्विास जीतने और उससे रश्तिा मजबूत बनाने की सलाह दी थी। अब अंतर यह हुआ है कि मां को पछताने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि बेटा मां की एक-एक बात सुनता है।
नहीं निकालें बच्चे पर अपना गुस्सा
बच्चे को डांटने के बाद पछतावा हो रहा है तो खुद के अंदर झांकने की सख्त जरूरत है। सबसे पहला सवाल खुद से पूछिए कि कहीं आपने बच्चे को पंचिंग बैग तो नहीं बना रखा है? डॉ. आराधना कहती हैं, ‘मांएं जब परिवार में किसी से नाराज होती हैं, तो गुस्सा बच्चों पर उतार देती हैं। आपको बाद में पछतावा ना हो इसलिए शुरू से खुद पर कंट्रोल रखिए कि कहीं आप बच्चे को सिर्फ अपना गुस्सा निकालने का साधन तो नहीं बना रही हैं?
बचें इमोशनल ब्लैकमेलिंग से ज्यादातर माता-पिता डांटने के बाद बच्चे को खुश करने की कोशिश में जुट जाते हैं। बच्चा रोने लगता है तो उसे उसका पसंदीदा सामान दिलवा देते हैं। पर यह गलत है। बच्चे इन मामलों में कई बार माता-पिता का फायदा उठाने लगते हैं। डॉ. आराधना यही मानती हैं, ‘बच्चे ने सच में गलती की है और आपने भी उसे डांट दिया है, तो तुरंत उसे कुछ खरीद कर देने की बात न करें। क्योंकि अगली बार बच्चा मनपसंद चीज के लिए ऐसे ही रोएगा और इमोशनल ब्लैकमेलिंग करेगा। आगे चलकर बच्चा इसे मनपसंद सामान लेने का जरिया बना सकता है।

 

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