यूं सुलझी एक संगीतकार की उलझन


संगीतकार अर्जुना हरजाई के सामने एक चुनौती थी कि तीन ऐसे गाने बनाने हैं जिनमें वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल एकदम नहीं या न के बराबर हो। ऐसे में उन्होंने ऐसी क्या जुगत लगाई कि यह सोच साकार हो गई, आइए जानते हैं अर्जुना से।गानों को गढ़ते समय संगीतकारों के पास कई बार बड़ी अनूठी परेशानियां आती हैं जिनके बारे में उन्हें तो पता होता है लेकिन उन गीतों के रिलीज हो जाने के बाद भी आम लोगों को इसकी भनक भी नहीं लग पाती। एक ऐसी ही अनूठी परेशानी थी फिल्म लखनऊ सेंट्रल का पार्श्व संगीत और तीन गानों की धुनें बनाने वाले संगीतकार अर्जुना हरजाइ के सामने। दरअसल उन्हें इस फिल्म के गाने यह सोचकर बनाने थे कि जिन कैदियों पर इन्हें फिल्माया जाना है, वे जेल में बंद हैं और उनके पास कोई संगीत वाद्य नहीं हैं। स्थिति जरा टेढ़ी थी क्योंकि किसी वाद्य यंत्र के बिना एक प्रभावी गीत तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं था। अर्जुना बताते हैं,’मैंने ऐसी चीजों के बारे में सोचा जो जेल में बंद कैदियों को उपलब्ध हों सकती हैं। थाली, मिट्टी का ढेर, बालटी- इस तरह की कुछ चीजें मेरे जेहन में आईं। मैंने तय किया कि अब वाद्य यंत्रों की कमी को इन्हीं चीजों से पूरा करूंगा। और यही हुआ। स्टूडियो में इन गीतों की रिकॉर्डिंग के समय इन चीजों को बजाकर संगीत पैदा किया गया। साथ ही तौफीक कुरैशी ने अपने मुंह से और ताली बजाकर लयबद्ध संगीत तैयार किया। इस तरह यह चुनौती पूरी हुई।कौन हैं यह अर्जुना हरजाई? अगर हम कहें कि आप इससे पहले भी उनके बनाए संगीत में डूब चुके हैं तो शायद आपको याद न आए. तो चलिए, हम ही बताते हैं अर्जुना के करियर की शुरुआत के बारे में बताते हुए उनकी याद दिलाते हैं।

दिल्ली से मुंबई तक : दिल्ली के रहने वाले अर्जुना के मम्मी-पापा संगीत से जुड़े थे। जाहिर है, उनकी संगीत शिक्षा घर से ही शुरू हुई। वह अपने स्कूल में एक गायक के रूप में काफी सक्रिय रहते थे। इंटरमीडिएट पास करने के बाद वह साल 2006 में मुंबई आ गए। यहां उन्होंने सुरेश वाडेकर जी के संगीत संस्थान में दाखिला लिया। साउंड इंजीनियरिंग भी की। उन्होंने पाया कि संगीत निर्देशक किसी भी फिल्म के गानों के साथ सबसे ज्यादा वक्त बिताते हैं। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद उन्होंने तय किया कि वह संगीत निर्देशक ही बनेंगे। उन्होंने कई विज्ञापनों के जिंगल्स बनाए। वह बताते हैं,’मेरा बॉलीवुड में कोई परिचित नहीं था इसलिए मैं अंधेरे में तीर चला रहा था। हालांकि संघर्ष से मेरी संगीत को लेकर समझ काफी मजबूत हुई।
संघर्ष का लंबा दौर= अर्जुना हर रोज बैग टांगकर ट्रेन से नामी निर्माताओं के कार्यालय जाते थे यह सोचकर कि अपने गानों की सीडी वहां के अधिकारियों को देंगे तो शायद किसी को उनका काम पसंद आ जाए। धीरे-धीरे उन्हें समझ में आ गया कि डायरेक्टर, प्रोड्यूसर तो किसी नए संगीतकार से मिलते ही नहीं हैं। उन्हें दिल्ली में कुछ काम मिल रहा था पर वह इतने बड़े स्तर का नहीं था कि उसके बलबूते उनका गुजारा हो पाता। इस बीच एक सार्वजनिक शो में अर्जुना को विज्ञापन जगत के बड़े डायरेक्टर राजेश साठी जी मिले।
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राजेश जी ने अर्जुना को प्रसून जोशी के लिखे एक जिंगल की धुन कंपोज करने का काम दिया जो काफी मशहूर हुई। इसके बाद मशहूर बॉलीवुड गीतकार कुमार से अर्जुना की मुलाकात हुई। अर्जुना बताते हैं,’मैं उस वक्त टीटू एमबीए फिल्म का संगीत निर्देशन कर रहा था। मैं कुमार सर से एक गीत लिखवाना चाहता था पर यह संभव नहीं हो पाया। इसके बाद उस गीत को मेरी एक परिचित ने लिखा और अरिजित सिंह ने गाया। उस गीत ‘ओ सोणिये को सुनकर कुमार सर ने कहा कि इस गीत को न लिख पाना मेरा नुकसान है। इसके बाद कुमार सर ने ही मुझे निखिल आडवाणी जी से मिलवाया। तभी मुझे टीवी शो पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के और लखनऊ सेंट्रल में काम करने का मौका मिला। गायन, संगीत निर्देशन में एक का चुनाव मुश्किल :अर्जुना बहुत जल्द अपनी आवाज में एल्बम जारी करने की योजना बना रहे हैं। गाने और गानों को कंपोज करने में से चुनाव करना हो तो क्या करेंगे? वह कहते हैं,’यह बहुत मुश्किल सवाल है। मैं इन दोनों में से एक को नहीं चुन सकता। हालांकि मेरा मुख्य काम संगीत निर्देशन ही रहेगा। पर मैं यह भी चाहता हूं दूसरे संगीत निर्देशक मुझे गाने के लिए बुलाएं।
मनमाफिक काम करना गलत क्यों?
अर्जुना कहते हैं,’मुझे लगता है कि सबको अपना मनचाहा काम करने की छूट होनी चाहिए। अगर कोई गायक एक्टिंग करना चाहता है या कोई एक्टर गाना चाहता है, तो इसके लिए उसकी बुराई नहीं की जानी चाहिए। अगर उनका काम अच्छा हुआ तो दर्शकों का प्यार मिलेगा। नहीं हुआ तो सीख मिलेगी। आज प्रतिभाशाली लोगों के लिए मौके बहुत ज्यादा हैं। एक फिल्म में चार-चार संगीतकारों को मौका दिया जा रहा है।

 

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