तब अक्सर गली-मोहल्ले के लोग मुझ पर कॉमेंट पास करते डायना पेंटी

मॉडलिंग से करियर की शुरुआत करने वाली डायना पेंटी अपनी पहली ही फिल्म कॉकटेल से छा गई थीं। इन दिनों वह चर्चा में हैं, अपनी नई फिल्म परमाणु: द स्टोरी ऑफ पोखरण को लेकर। इस मुलाकात में डायना ने हमसे फिल्मों और करियर समेत तमाम यादों को ताजा किया :
आप ज्यादा फिल्मों में नजर नहीं आतीं। क्यों?
मुझे तो बहुत सारी फिल्में करनी हैं। पिछले दो साल में मैंने चार फिल्में की हैं, तो देखा जाए तो आकड़ा बुरा नहीं है। हैपी भाग जाएगी, लखनऊ सेंट्रल, परमाणु और हैपी फिर भाग जाएगी, जिसमें से हैपी फिर भाग जाएगी दो महीने बाद रिलीज होगी। मैं अलग-अलग तरह की भूमिकाएं करना चाहती हूं। इसलिए सही प्रॉजेक्ट के इंतजार में हूं। मैं वही फिल्म करना चाहती हूं, जो मेरे दिल को भाए। अब तक फिल्मों में मेरी भूमिकाएं काफी इंडिपेंडेंट रही हैं। मैं उसी तर्ज पर काम करना चाहती हूं।
आप सोशल मीडिया पर अक्सर अपने सरनेम को लेकर ट्रोल होती रही हैं। कैसे हैंडल करती हैं ट्रोल्स को?
पहले मुझे बुरा लगता था। तब मैं नई-नई थी, मगर अब मैं अपना फोन स्विच ऑफ करके सो जाती हूं। हाल ही में कठुआ वाले केस में मुझे बहुत ट्रोल किया गया। उस वक्त बहुत दुख हुआ था। देखिए अगर आपको लेकर की जाने वाली आलोचना कंस्ट्रक्टिव हो, तो अलग बात है, मगर कुछ लोग सिर्फ आपका मजाक उड़ाने या आपको नीचा दिखाने के लिए ट्रोल करते हैं। बात जब बढ़ जाती है, तो ब्लॉक का ऑप्शन तो है ही। मैं ऐसे लोगों को ब्लॉक कर देती हूं। कई बार इंस्टा या ट्विटर पर रिपोर्ट भी कर देती हूं और अपनी रिपोर्ट का फॉलोअप भी लेती हूं।
आप सोशल मीडिया को फायदेमंद मानती हैं?
निसंदेह यह बहुत बड़ा प्लैटफॉर्म है। आप पॉजिटिव और कंस्ट्रक्टिव सोच के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। सोशल मीडिया के जरिए आप कई लोगों तक पहुंच सकते हैं। आप इसके जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। अब प्तद्वद्गह्लशश जैसे कैंपेन ने लोगों के बीच बहुत जागरूकता फैलाई। मुझे लगता है, सोशल मीडिया आपकी जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। हम जैसे कलाकारों के कई फॉलोवर्स भी होते हैं। ऐसे में कुछ पोस्ट करना हो, तो सोच-समझकर करना चाहिए। इसका नकारात्मक पहलू ये है कि कई लोग ट्विटर हैंडल के पीछे छुपकर कुछ भी अनाप-शनाप बकते हैं।
सोशल मीडिया पर तो आपने मोलेस्टेशन या छेडख़ानी के खिलाफ आवाज उठाई है, मगर क्या असल जिंदगी में आपने छेडख़ानी के खिलाफ कभी स्टैंड लिया है?
कई बार। मुझे लगता है दुनिया की ऐसी कोई औरत नहीं होगी, जो कभी किसी छेडख़ानी का शिकार न हुई हो। राह चलते हुए आप पर फब्तियां कसा जाना आम बात है। मैं जब किशोरावस्था में थी, तो अक्सर गली-मोहल्ले के लोग मुझ पर कॉमेंट पास करते थे। उस वक्त मैं गुस्से में लाल-पीली हो जाया करती थी। लोग मुझे घूर कर देखते, तो मैं भी पलटकर उन्हें घूर कर देखती। कई बार तो पूछ भी लेती, ऐ क्या देख रहा है? तब वह शरमा कर दूसरी तरफ देखने लगते। एकाध बार तो मैंने छेडख़ानी करनेवाले पर हाथ भी उठा दिया था। दूसरे देशों में तो मोलेस्टेशन और बलात्कार को लेकर सख्त कानून हैं। वैसे निर्भया के बाद हमारे यहां भी कड़े कानून बने हैं, मगर उनका लागू होना जरूरी है। मैं कई देशों में घूम चुकी हूं और कह सकती हूं कि मुंबई लड़कियों के लिए बहुत सेफ है।
जॉन की मौजूदगी में कहीं अपने किरदार को लेकर कोई असुरक्षा थी?
फिल्म में मेरा स्ट्रॉन्ग औरत का किरदार है। यही वजह है कि मैं यह फिल्म करने को राजी हुई। असुरक्षित होने का सवाल ही नहीं था, क्योंकि मेरा किरदार बहुत दमदार है। इस फिल्म के किरदार काल्पनिक है, पर फिल्म की कहानी और तथ्य सच्चे हैं। निर्देशक अभिषेक ने कहा की हम इस फिल्म के किरदार काल्पनिक रखेंगे, क्योंकि कुछ सुरक्षा कारणों से हम वास्तविक नामों का इस्तेमाल नहीं कर सकते। मैं इस फिल्म में एक मिशन पर हूं। वह मिशन क्या है, उसके बारे में बता नहीं सकती, मगर मेरा किरदार आपको पसंद जरूर आएगा। इस किरदार के लिए मैंने फिजिकल ट्रेनिंग भी ली। मैंने किक बॉक्सिंग भी सीखी। मैं लगातार जिम जाती रही।
जॉन के साथ काम करने का अनुभव कैसा था ?
बहुत अच्छा था, क्योंकि जॉन बहुत अच्छे इंसान हैं और साथ ही वह काफी प्रफेशनल भी हैं। वह जो काम और प्रॉजेक्ट करते हैं, उसमें अपना 200 प्रतिशत देते हैं। काम के प्रति उनका समर्पण देखते बनता है। वह जो भी करते हैं, दिल से करते हैं। फिल्म के निर्माता होने के नाते हर चीज पर उनकी पैनी नजर थी। वह हमेशा सजग रहते थे कि कहीं कुछ छूट न जाए। निर्माता के रूप में वह विकी डोनर और मद्रास कैफे जैसी कंटेंट प्रधान फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। मैंने जब परमाणु साइन की, तब मुझे इस बात का पूरा अहसास था कि मैं सुरक्षित हाथों में हूं। वह काफी प्रैक्टिकल हैं। सेट पर जोक्स मार कर माहौल को खुशनुमा बनाए रखते थे।
परमाणु परीक्षण पर आधारित फिल्म की शूटिंग के दौरान किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
चुनौतियां तो कई थीं। जब हम राजस्थान में मई या जून में शूटिंग कर रहे थे, तब वहां का तापमान 45 डिग्री था और हमें रेगिस्तान में शूटिंग करनी थी। देखा जाए, तो सीधा सूरज और गर्मी। राजस्थान में बालू का तूफान आम है। हमें सारी चीजें ढकनी पड़ती थीं और कई बार काम रोकना पड़ता था। रियल क्लाइमेट में काम करने का अनुभव अलग था। जैसलमेर में शूटिंग करना यादगार रहा।

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