मुश्किल काम है टीनेज बच्चे की मां होना काजोल

Kajol Children Interview

अपने बच्चों की अच्छी परवरिश करना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है। फिर चाहे वह कोई आम आदमी हो या फिर कोई सिलेब्रिटी। हाल ही में हमसे हुई खास बातचीत में काजोल ने बच्चे पालने से जुड़ी चुनौतियों के बारे में बात की। मैं समझदार नहीं थी आजकल के बच्चों की गंभीरता और अनुशासन को देखकर मुझे बड़ी हैरानी होती है। मैं तो बचपन में बेहद शरारती थी। मुझमें जरा सी भी समझदारी नहीं थी। मुझे याद है कि छुट्टियों के वक्त मेरी मां हमें लोनावला ले जाया करती थीं। मैं अपने गर्ल गैंग के साथ जमकर मस्ती किया करती थी।

बच्चों से सॉरी कहने से नहीं हिचकिचाती

कई बार बच्चों को जिस चीज की सीख दे रही होती हूं और भूलवश वही गलती कर बैठती हूं तो मैं बच्चों से सॉरी बोलने पर जरा भी नहीं हिचकिचाती। वहीं अजय की बात करूं तो उन्हें लगता है कि वह कोई गलती करते ही नहीं और वह पूरी तरह परफेक्ट हैं। वैसे साफ-सफाई को लेकर अजय बहुत पर्टिक्युलर हैं, उन्हें तो ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर (ओ.सी.डी) है। यानी कि उन्हें हर चीज जमी हुई और सुव्यवस्थित चाहिए।

अब समझदार हो गए हैं लोग

मुझे इस पहल से जुड़े हुए लगभग पांच साल हो चुके हैं। यह बेहद ही लंबा सफर रहा है। जब हमने इसकी शुरुआत की थी, तो हमें उस वक्त बहुत दिक्कतें आई थीं। लोगों को यह समझाना कि इसकी जरूरत क्या है, बेहद ही मुश्किल था। दरअसल हमारे समाज में इतने बड़े-बड़े और ज्वलंत मुद्दे पहले से ही हैं कि ऐसे में लोगों में साफ-सफाई को लेकर जागरूकता फैलाना बहुत कठिन काम है। अमूमन लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझते हैं और ऐसी पहल को महत्व तक नहीं देते हैं। लोग तब ही किसी चीज का सपॉर्ट करते हैं, जब इसके पीछे कोई बड़ा कारण हो। ऐसे में हमने लोगों को समझाया कि हाथ धोना कितना जरूरी होता है और साथ ही यह भी समझाया कि अगर वे इसे नजरअंदाज करेंगे, तो आगे चलकर भविष्य में इसके कई दुष्परिणाम हो सकते हैं। खुशी की बात है कि देर से ही सही, लेकिन लोगों ने इसकी गंभीरता पहचानी और वे बड़े पैमाने पर इस पहल से जुड़ रहे हैं। अब लोगों ने हमें गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है।

इस पहल की जरूरत नहीं होनी चाहिए

जब मैं इस पहल से जुड़ी, तो मुझे उस वक्त ही लगा था कि हमें इस पहल की बहुत ही जरूरत है। लोग इस बात से अंजान हैं कि महज हाथ न धोने से कितनी बड़ी समस्या हो सकती है। अगर रिपोर्ट्स देखें, तो कई गांवों में ऐसे बच्चे हैं, जो गंदगी की वजह से डायरिया, मलेरिया और निमोनिया के शिकार हो गए और पांच साल की उम्र से पहले मर गए। मैं मानती हूं कि हर इंसान को जीने का पूरा हक है और ऐसे में अगर गंदगी की वजह से जिंदगी ही खत्म हो जाए, तो वह सही नहीं है। इसलिए मैं चाहती हूं कि हर कोई इससे जुड़े। हम पिछले 5 साल से ‘एव्री चाइल्ड रीच फाइव’ नाम की पहल चला रहे हैं। इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कई गांव-कस्बों में बच्चे पांच साल की उम्र से ऊपर नहीं पहुंच पाते हैं।

बच्चों से जुड़ी समस्याओं पर हो बात

वैसे तो हमारे देश में बहुत से मुद्दे हैं, जिन पर बात होनी चाहिए। लेकिन मैं मानती हूं कि बच्चों से जुड़ी समस्याओं का समाधान बहुत जरूरी है। वे हमारे देश का भविष्य हैं। बच्चे हमारी पॉप्युलेशन में 50 प्रतिशत योगदान देते हैं। इसके बावजूद उनको गंभीरता से नहीं लिया जाता है। कई अस्पतालों में बच्चों के लिए बेड तक नहीं हैं। शिक्षा, बालश्रम, गरीबी आदि कई समस्याएं हैं, जिन पर सरकार को नजर डालने की आवश्यकता है।

 

 

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