अगर सर्दी में बन जाते हैं आलसी, तो अपनाएं ये टिप्स

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

न! किचन खानपान के सामान से भरा, कमरों में धीमी रोशनी और बिस्तर से रजाई हटने का नाम नहीं लेती। इन सबके बीच आपका और परिवार का सुस्ती के आगोश में आना शुरू हो जाता है। कभी ध्यान दिया है कि ऐसे में आप कितने काम कल पर टालना शुरू कर देती हैं? मौसम का बदलाव दिनचर्या को पूरी तरह से प्रभावित कर देता है। हां, ये मौसम जानवरों के लिए लंबी और गहरी नींद का बढिय़ा मौका होता है, लेकिन हम इंसान सुस्त नहीं रह सकते। मौसम कोई भी हो, जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता है और कदम से कदम मिलाने के लिए ऊर्जा से भरपूर रहना बेहद जरूरी है। जानकारों की मानें तो एक तरफ सर्दियां जहां लोगों के लिए उत्साह भरा मौसम होता है, वहीं कुछ लोगों के लिए यह मौसम सुस्ती और निराशा का सबब बन जाता है। कहीं न कहीं ये एहसास सभी को होता है, लेकिन इसका बढ़ जाना सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर कहलाता है। आईएमए की इस साल की रिपोर्ट की मानें तो भारत में इस समस्या से करीबन एक करोड़ लोग प्रभावित हैं। इनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
क्या है एसएडी?
सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर एक तरह का अवसाद है। ये समस्या यूं तो सर्दी के मौसम भर के लिए ही होती है, लेकिन इसका होना कभी-कभी गंभीर अवसाद का रूप ले लेता है। मनोवैज्ञानिक डॉ. स्मिता श्रीवास्तव बताती हैं कि इस समस्या से जूझने वाले मरीज आत्महत्या तक कर लेते हैं। जरूरी है तो समय रहते इसकी पहचान करना और उचित चिकित्सकीय सलाह लेना। वैसे तो ये समस्या ठंडे देशों में ज्यादा होती है, लेकिन उत्तर भारत भी इससे अछूता नहीं है। इसका मुख्य कारण धीमी रोशनी में सुस्त पड़े रहना होता है। सर्दियों में सूरज की रोशनी कम हो जाती है, ऐसे में ज्यादातर लोग घर में रहना और बिस्तर से बाहर न निकलना पसंद करते हैं। बस, यहीं से शुरुआत होती है इस बीमारी की। कम रोशनी में हमारे शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है, जो नींद को बढ़ावा देता है। ये थकान तो महसूस कराता ही है, साथ ही दिमाग में सुस्ती भी ले आता है। रानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज की डॉ. नूतन अग्रवाल बताती हैं कि यह समय पहले से अवसाद में जूझ रहे लोगों के लिए बेहद मुश्किल होता है। ऐसे मरीजों को मेलाटोनिन की दवाइयां दी जाती हैं।
ये हैं लक्षण
ज्यादा सोना, दिन भर सुस्त बने रहना और निराश महसूस करना इस समस्या के शुरुआती लक्षण हैं। डॉ. स्मिता बताती हैं कि ऐसे में मरीज का मूड बदलना शुरू हो जाता है। ऊर्जा में कमी आ जाती है और व्यक्ति ज्यादा खाना भी शुरू कर देता है। इस तरह की दिनचर्या में निराशा भी साथ हो लेती है। लोग इस दौरान कार्बोहाइड्रेट वाले खाने का भी ज्यादा सेवन करने लगते हैं, जिससे मोटापा भी बढऩा शुरू हो जाता है। वैसे तो इस तरह की दिनचर्या दीपावली के बाद सभी की शुरू हो जाती है, लेकिन ऊर्जा में कमी का बने रहना अवसाद का रूप ले लेता है। खतरे की घंटी तब सुन लेनी चाहिए, जब व्यक्ति निराशा भरी बातें या आत्महत्या का जिक्र करने लगे। ऐसे में जरूरी है विशेषज्ञ से परामर्श लिया जाए। इस समस्या को तब भी पहचाना जा सकता है, जब व्यक्ति लोगों से मिलना-जुलना कम कर दे या फिर काम में उसका रुझान कम होने लगे।
यूं रहें ऊर्जा से भरपूर
सर्दी ज्यादा है, काम करने का मन नहीं कर रहा। ये बात अकसर ही इस मौसम में सुनने को मिलती है। ठंड में खुद में सिकुड़े रहना, रजाई का दामन न छोडऩा और जम कर खाना एक आम-सी बात है, लेकिन ये ऊर्जा में गिरावट भी ला देता है। ऊर्जा बनी रहे और आप अपने सभी काम उत्साह के साथ कर सकें और किसी भी तरह की गंभीर समस्या से बचे रहें, इसके लिए कुछ उपाय अपनाए जा सकते हैं। यूं तो ये उपाय बेहद आसान हैं, लेकिन इनको अपना लेना आपकी सर्दियों को भी ऊर्जावान बना देता है।
रहें भरपूर रोशनी में
इस दौरान सूरज की रोशनी कम पडऩे लगती है, इसलिए अपने आसपास रोशनी की कमी न होने दें। धीमी रोशनी से बेहतर है कि सफेद रोशनी का इस्तेमाल किया जाए। ऐसा घर के अलावा कामकाज वाली जगह पर भी जरूर करें। तेज रोशनी निराशा में डूबने से बचाती है। डॉ. स्मिता बताती हैं कि एसएडी वाले मरीजों का तो खास लाइट थेरेपी देकर इलाज किया जाता है। इसके लिए इस्तेमाल की जाने वाली रोशनी बहुत तेज होती है।
न भूलें व्यायाम
यूं तो व्यायाम हर मौसम के लिए जरूरी होता है, लेकिन खास सर्दियों के दौरान इसकी अहमियत बढ़ जाती है। इस माध्यम से शरीर में गई ज्यादा कैलोरी बर्न होती है और ऊर्जा का भरपूर संचार बना रहता है। धमनियों में रक्त का प्रवाह भी दुरुस्त बना रहता है। इन दिनों मांसपेशियों में अकडऩ आने लगती है, जिस कारण ऊर्जा में गिरावट शुरू हो जाती है। इससे निजात पाने के लिए स्ट्रेचिंग का सहारा लेती रहिए। गरम सिंकाई भी मददगार रहती है।
तापमान रखें संतुलित
ठंड में ठिठुरते हुए काम से दूर भागने से बेहतर है अपने वातावरण में सही तापमान को बनाए रखें। गर्माहट के तमाम इंतजाम आपको ऊर्जावान बनाए रखेंगे। कमरे का सही तापमान आपको बिस्तर से दूरी बनाने में भी सहायक होगा।
कम करें कैफीन का सेवन
शरीर में गर्मी लाने के लिए आप अगर कॉफी का सेवन बढ़ा रही हैं तो ठहर जाइए। ज्यादा कॉफी पीने से नींद कम आती है। नींद का प्रभावित रहना तनाव का कारण बन जाता है। कमोबेश चाय का भी यही किरदार है। चाय-कॉफी को संतुलित रखते हुए आप दूसरे पेय पदार्थों को भी अपना सकती हैं।
खूब घूमें-फिरें
घूमने के शौकीन तो इस मौसम में मौज-मस्ती का कोई भी मौका चूकते नहीं, लेकिन इसके विपरीत कुछ लोग घर से बाहर निकलने से बचने की कोशिश करने लगते हैं। अगर आप इस दूसरे वर्ग से हैं तो खुद को बदलने की कोशिश करें। बाहर घूमने और मौज-मस्ती करने से दिनचर्या बदलेगी और आपको तनाव से मुक्ति मिलेगी। घूमने से आपकी खोई ऊर्जा लौट आएगी।
बनाए रखें पुराना रुटीन
गुलाबी मौसम में देर तक सोने का चलन है और यही पूरी दिनचर्या को चौपट करने के लिए काफी है। देर तक की नींद या बार-बार अलार्म को नजरअंदाज करना बंद करें और पुरानी दिनचर्या पर टिके रहने की कोशिश करें। रात को पुराने रुटीन के अनुरूप सोना और सुबह उतने ही समय उठना, साथ ही बाकी कामों को ढील न देना आपकी ऊर्जा में गिरावट नहीं लाने देता।
स्वस्थ खानपान अपनाएं
ठंड के मौसम में भूख ज्यादा लगती है और इस भूख को मिटाने के लिए बाजार में उपलब्ध स्नैक्स की ओर हमारा हाथ अपने-आप बढऩे लगता है। ठंड के मौसम में कार्बोहाइड्रेट का सेवन अनजाने में ही बढऩे लगता है। यह मोटापे और सुस्ती को बढ़ावा देता है। खानपान में पोषण का पूरा ध्यान रखें। स्नैक्स के रूप में सूप एक बेहतर विकल्प है। इसके अलावा शरीर में पानी की कमी भी न होने दें। ठंड के मौसम में प्रोबायोटिक और खमीर वाले खाद्य पदार्थ खूब खाएं।

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