अपनी बेटी को लेकर बहुत इन्सिक्यॉर हूं

मनोज बाजपेयी बॉलिवुड के समर्थ अदाकारों में से हैं। किरदारों की रूह में जाना उन्हें खूब आता है। उनके सशक्त अभिनय से सजी अय्यारी भले ही बॉक्स ऑफिस पर अपना जलवा न दिखा सकी, मगर उनकी हालिया रिलीज बागी 2 100 करोड़ की राह पर है। इस फिल्म में मनोज एक बार फिर अलहदा अंदाज में दिखे। अब वह चर्चा में हैं अपनी अगली फिल्म मिसिंग से। इस फिल्म में वह अभिनेता के अलावा सहनिर्माता भी हैं। इस मुलाकात में वह फिल्म, अपनी बेटी, तब्बू, अय्यारी की नाकामी जैसे कई विषयों पर बात कर रहे हैं।
काश, इसका आधा भी मेरे घर आ जाता। (हंसते हुए) वैसे, मैं टाइगर के लिए बहुत खुश हूं। उसने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की है। शूटिंग के समय हमने वह मेहनत देखी थी। मैं अहमद खान के लिए खुश हूं क्योंकि उन्हें जरूरत थी इस हिट की। अहमद खान मेरा बहुत पुराना दोस्त है। अगर आपको याद होगा, तो ‘सत्या’ का ‘सपने में मिलती है…’ उसी ने कोरियॉग्राफ किया था। मैंने यह फिल्म उसके सपॉर्ट में की है। आप सभी जानते हैं कि अमूमन मैं कमर्शल-मसाला फिल्मों का हिस्सा नहीं होता। इस फिल्म को करने के लिए मैं इसलिए राजी हुआ कि अहमद चाहता था कि मैं यह रोल करूं। मैंने दोस्त के लिए फिल्म की और दोस्त की फिल्म सुपर हिट हो गई है, तो इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है।
आपकी हालिया फिल्म मिसिंग बच्ची के अगवा होने की कहानी है। बेटी के पिता होने के नाते उसकी सुरक्षा को लेकर घबराहट होती है?
मुझे तो बहुत घबराहट होती है। मेरा मानना है कि बच्चों के साथ में कुछ भी गलत होता है, तो हर तरह से माता-पिता ही जिम्मेदार हैं। हमने अपने परिवार में बेटी को लेकर एक नियम बनाया है कि जब तक वह एक खास उम्र की नहीं हो जाती, हम अपनी बेटी को आंखों के सामने से ओझल नहीं होने देंगे। वह सिर्फ उतने समय तक दूर रहती है, जब वह स्कूल में होती है। उसके पहले या उसके बाद हम उसको मेड के सहारे नहीं छोड़ते। हमारी कोई चाइल्ड मेड या नैनी नहीं है। हम अपनी बच्ची को लेकर बहुत केयरफुल हैं। भगवान करे कि सबकुछ अच्छा रहे, मगर आजकल बच्चों पर खतरा बहुत है। मैं तो बहुत ही इन्सिक्यॉर पिता हूं। अभी हाल ही में मेरी पत्नी बेटी के साथ दिल्ली जा रही थी, तो मैं बार-बार फोन पर उसे कह रहा था कि वह बेटी का हाथ पकड़कर रखे। मेरा डर था कि कहीं वह बेटी का हाथ छोड़ न दे। मेरी बेटी अभी महज 7 साल की है। आज चाइल्ड ट्रैफिकिंग बहुत बढ़ गई है। बच्चों को लेकर कई तरह की बुरी चीजें बढ़ गईं है, तो माता-पिता का सतर्क रहना जरूरी हो गया है।
आपकी हीरोइन तब्बू का कहना है कि उन्होंने सेट पर आपको बहुत परेशान किया और खूब नखरे दिखाए?
हां। वह नखरे दिखाती हैं और वह इसलिए कि मैं उनका दोस्त हूं। उन्होंने मुझे कतई परेशान नहीं किया। असल में जब वह शूटिंग पर आईं, तो मैंने उनसे कहा कि रिजॉर्ट में जो सबसे अच्छा कमरा है, वह उसे चुन लें। वह मेरी प्रिय दोस्त हैं और मेरी फिल्म की हीरोइन, तो उन पर खास तवज्जो देना मेरा फर्ज बन जाता है। हम सालों से दोस्त हैं। जब भी कुछ साझा करना होता है, हम एक-दूसरे को फोन लगा देते हैं। तब्बू को मैं अपने परिवार का हिस्सा मानता हूं। ‘घात’ और दिल पे मत ले यार के बाद जब उनके साथ इस बार काम किया, तो मुझे उनमें काफी बदलाव नजर आया। अभिनेत्री के रूप में तो वह कई मील आगे बढ़ीं हैं। वह एक मकबूल और मजबूत अदाकारा हैं। उन्होंने प्रॉडक्शन में भी मेरी काफी मदद की। मुझे खुशी इस बात की है कि तब्बू जैसी अभिनेत्री मेरे को-प्रॉडक्शन की पहली फिल्म में काम कर रही हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि फिल्म में मैंने सारा फोकस अपने ऊपर रखा है। तब्बू इसमें लीड हैं और मैं दूसरे-तीसरे नंबर पर हूं।
फिल्म को बनकर प्रदर्शित होने में 4 साल क्यों लग गए?
4 साल नहीं बल्कि साढ़े 3 साल। असल में हम तीनों मेरे, तब्बू और अन्नू कपूर जी के इक डेट्स मिलना मुश्किल था। फिर पोस्ट प्रॉडक्शन में समय लगा। मुकुल अभ्यंकर (डायरेक्टर) ने इस फिल्म को कई बार एडिट करवाया। फाइनल ड्राफ्ट को अप्रूव करने में हमें बहुत समय लगा। थ्रिलर जॉनर को ध्यान में रखते हुए हम कहानी के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं करना चाहते थे। फाइनल ड्राफ्ट के बाद इसके संगीत के लिए एमएम करीम साहब का पीछा करना बहुत मुश्किल था। हम सभी चाहते थे कि करीम साहब ही इसका संगीत दें, क्योंकि उनके अलावा फिल्म के संगीत को कोई न्याय नहीं दे सकता था। फिर हम इस फिल्म को पिछले साल प्रदर्शित करनेवाले थे, मगर इसे फीचर फिल्म के रूप में सिनेमा हॉल में रिलीज करें या किसी डिजिटल प्लैटफॉर्म का इस्तेमाल करें? इस मुद्दे पर दुविधा में थे।
अय्यारी से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं, क्या लगता है, क्या कसर रह गई?
प्रदर्शन की तारीखों का बार-बार बदलना फिल्म के लिए घातक साबित हुआ। पूरी दुनिया ने देखा था कि हम रिलीज डेट को लेकर किस तरह से फंस गए थे, जहां पर दो बड़ी फिल्मों ने हमारे साथ ही आना उचित समझा और हमने विवेकी होकर उस क्लैश को टालने की पहल की। हम चाहते थे कि हमें सोलो रिलीज का फायदा मिले, मगर वह अंत तक नहीं हो पाया। फिल्म अगर अपनी तयशुदा तारीख पर रिलीज होती, तो फिल्म को यकीनन फायदा मिलता। ‘अय्यारी’ भले चली नहीं, मगर यह मेरे करियर की सबसे अहम फिल्म है और ये मैं इसलिए कह रहा हूं कि एक कलाकार के रूप में मैं अपने अभिनय के क्राफ्ट को अलग स्तर तक ले जा पाया। वैसे भी जिन फिल्मों में मेरे अभिनय की वाहवाही होती है, वे फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पैसे नहीं काम पातीं।
तो क्या दमदार स्क्रिप्ट के कारण ही आप निर्माता बनने को प्रेरित हुए?
मैं नीरज पांडे जी के कारण प्रड्यूसर बना। असल में मेरा स्वभाव बहुत ही पारदर्शी है। या तो मैं हंसता हूं या गुस्सा होता हूं। मैं जरा भी डिप्लोमैटिक नहीं हूं और निर्माता को बीच में रहना पड़ता है। कई बार मैं एक्सट्रीम पर पहुंच जाता हूं, तो मैं निर्माता नहीं बन सकता। अब सोचता हूं, तो लगता है कि नीरज पांडे और शीतल भाटिया ने मुझे इसलिए भी प्रड्यूसर बनाया कि मैं शूटिंग करवा सकूं क्योंकि वे लोग किसी और फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे। मुझे लगता है मेरे खिलाफ यह साजिश रची गई। (हंस देते हैं)

 

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