कुआलालंपुर यहां आसमां छू सकते हैं आप रोशनी के शहर में क्या-क्या देख सकते हैं आप

मलेशिया का चप्पा-चप्पा अपने टूरिज़म के नारे पर खरा उतरता है। वहां क्या-क्या नहीं है? अमेरिकी स्काई लाइन का मुकाबला करती गगनचुंबी इमारतें, नेपाल से मिलते-जुलते हरे-भरे शिखर, भारत जैसे नीले गहरे सागर तट और दुबई-सा शॉपिंग जलवा। मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर उतरते ही एयरपोर्ट की शान दंग करती है और फिर, समूचे मलेशिया में बिजली और पानी की कोई कमी नहीं है। कुआलालंपुर की इमारतें, सड़कें और पेड़ तक लाइटों से जगमग करते हैं इसलिए यह रोशनी का शहर भी कहलाता है…
बेमिसाल है ट्विन टावर
कुआलालंपुर के स्काई हाई पेट्रोनाज ट्विन टावर दुनिया में सबसे ऊंचे हैं और मलेशिया की बहुमुखी ऊंचाइयों की मिसाल हैं। ट्विन टावर कुआलालंपुर का लैंडमार्क बनकर उभरा है। मीनार कुआलालंपुर भी देखने लायक है। मीनार की चोटी से शहर का 360 डिग्री का नजारा दिखता है। 421 मीटर ऊंचे कंकरीट टावर एशिया में कम ही हैं।
धूमधाम से मनाया जाते हैं त्योहार
मलेशिया इस्लामिक देश है। फिर भी, यहां मस्जिदों के साथ-साथ चीनी और हिन्दू मन्दिरों पर भी भक्तों के मेले लगते हैं। फेस्टिवल धूमधाम से मनाए जाते हैं। गैर इस्लामी त्योहारों में सबसे बड़ा त्योहार थाईपुसम है। कुआलालंपुर के नजदीक बाटू गुफा में भगवान शिव पुत्र मरूग का महामंदिर है। यहीं हर साल जनवरी या फरवरी में थाईपुसम मनाया जाता है। भक्त जिस्म पर बर्छी, सुइयां वगैरह चुभो-चुभो कर मन्नत मांगते हैं।
सागर तटों के लिए है मशहूर : मलेशिया मॉडर्न सिटीज और शांत सागर तटों के लिए फेमस है। सागर में मूंगों, मछलियों और समुद्री जीवों की अनंत दुनिया है। पलूशन से रोकथाम के लिए मरीन पार्क बनाए गए हैं। मूंगों की खेती पर लंगर डालने, वॉटर स्कीइंग, स्पीड बोट रेसिंग, मछली पकडऩे, मूंगा तोडऩे, तटों पर आग जलाने वगैरह पर सख्त रोक है। हालांकि टूरिस्ट अट्रैक्शन के मद्देनजर अंडर वॉटर तैराकी और फटॉग्रफी करने की मनाही नहीं है। नामी-गिरामी मरीन पार्कों में, कुआला केदाह और लंकावी के नजदीक पुताओ पॉपार, पुलाओ काका, पुलाओ लेम्बू और पुलाओ सेगारेंग शुमार हैं।
गेन्टिंग हाइलैंड्स का जलवा: कुआलालंपुर के आसपास मौज-मस्ती का फुल इंतजाम है। सनवे लगून, माइंस वंडरलैंड, सफारी लगून वॉटर थीम पार्क आदि का रुख कर सकते हैं। सनवे लगून साउथ अफ्रीका की सन सिटी का मिनी रूप है और है ब्यूटीफुल हिल स्टेशन- गेन्टिंग हाइलैंड्स। कुआलालंपुर के नजदीक ही है- 15 किलोमीटर का टेढ़ा-मेढ़ा पहाड़ी सफर सड़क से तय करते हैं, करीब एक घंटा लगता है। आखिरी 20 मिनट का सफर गेन्टिंग स्काई-वे से कवर करते हैं। करीब 200 ट्रॉलियां टूरिस्टों को फटाफट लाने-ले जाने में जुटी हैं। यहां है दुनिया की सबसे तेजी से घूमती मोनो केबल कार। आगे सचमुच सपनों की दुनिया है। सारा-सारा दिन कोहरा छाया रहता है। फैंटसी और रोमांच की अनूठी दुनिया है। लंबे चौड़े रेस्तरां हैं- ऐसे जैसे आप ख्वाब में भी नहीं सोच सकते। हजार-दो हजार लोग एक साथ बैठ कर खाना खाते हैं। थिअटर, कसीनो, गोल्फ, इंडोर और आउटलेट थीम पार्क, शॉपिंग वगैरह क्या-क्या नहीं है। जिस ओर देखो-बस टूरिस्ट ही टूरिस्ट नजऱ आते हैं।
साउथ इंडियन लोग भी और फूड भी: कुआलालंपुर में नाइट लाइफ बेरोक-टोक जारी है। मुस्लिम युवतियां सिर पर स्कार्फ बांधे घूमती हैं। और तो और, होटल, एयरपोर्ट, स्टोर्स वगैरह में बखूबी काम भी करती है। यहां आने-जाने के लिए उम्दा पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम है। मेट्रो, बस और टैक्सी कोई भी ऑप्शन चुन सकते हैं। इंटरनैशनल फास्ट फूड आउटलेट्स भी हैं। मलेशिया की आधी आबादी मुस्लिम है। 40 फीसदी चीनी और 10 फीसदी साउथ इंडियन हैं। इसीलिए वहां ढाबों और रेस्तरां पर नॉर्थ इंडियन फूड से ज्यादा साउथ इंडियन फूड मिलता है।
दिल्ली से महज साढ़े 4 घंटे की दूरी: दिल्ली से कुआलालंपुर पहुंचने में करीब साढ़े 4 घंटे लगते हैं। समय के लिहाज से मलेशिया अपने देश से ढाई घंटे आगे है यानी अगर यहां दोपहर के 2 बजे हैं, तो मलेशिया में शाम के साढ़े 4 बजे होंगे। ईस्ट और वेस्ट दुनिया के बीच है पेनिनसुला मलेशिया। ग्लोब पर इधर-उधर दोनों तरफ से रास्ते हैं। इसीलिए ईस्ट और वेस्ट दोनों का दिलकश फ्यूजन साफ झलकता है। मौसम ट्रॉपिकल है- आमतौर पर तापमान 26 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। पहाड़ी इलाकों में तापमान 18 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। मूसलाधार बारिश यहां आम बात है। यहां की करंसी है रिंग गिट या रूङ्घक्र। एक रिंग गिट’ या रूङ्घक्र करीब साढ़े 15 रुपये का है।

मलेशिया का चप्पा-चप्पा अपने टूरिज़म के नारे पर खरा उतरता है। वहां क्या-क्या नहीं है? अमेरिकी स्काई लाइन का मुकाबला करती गगनचुंबी इमारतें, नेपाल से मिलते-जुलते हरे-भरे शिखर, भारत जैसे नीले गहरे सागर तट और दुबई-सा शॉपिंग जलवा। मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर उतरते ही एयरपोर्ट की शान दंग करती है और फिर, समूचे मलेशिया में बिजली और पानी की कोई कमी नहीं है। कुआलालंपुर की इमारतें, सड़कें और पेड़ तक लाइटों से जगमग करते हैं इसलिए यह रोशनी का शहर भी कहलाता है…

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