रीमिक्स बनाने वालों को लता दीदी ने जमकर फटकारा, कहा- बेतुकापन और संगीत का खिलवाड़ देख पीड़ा होती है

भारतरत्न, कोकिलकंठी लता मंगेशकर आमतौर पर किसी तरह का विवादित बयान नहीं देती हैं, लेकिन आज गीतकार जावेद अख्तर से फोन पर न जाने क्या बात हुई कि लता दीदी को गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने सोशल साइट पर एक ओपन लेटर के जरिए रीमिक्स बनाने वाले संगीतकारों, गीतकारों और गायकों सहित म्यूजिक कंपनियों को भी जमकर फटकारा।
लता दीदी ने लिखा – नमस्कार। जावेद अख्तर साहब से मेरी टेलिफोन पर बात हुई, उसके बाद मुझे महसूस हुआ कि मुझे कुछ लिखना चाहिए। तो वह बात आप सबके साथ साझा कर रही हूं। हिंदी चलचित्र संगीत का एक अनुपम दौर था। इसे स्वर्णिम युग कहा जाता है। इस दौर के सिनेमा के गीत भारतीयों के ह्रदय में वर्षों से रचे-बसे हैं। आज भी यह गीत करोड़ों रसिक पसंद करते हैं और आगे भी पसंद करते रहेंगे।
कुछ समय से मैं देख रही हूं कि स्वर्णिम युग से जुड़े गीतों को नए ढंग से रीमिक्स कर पुन: पेश किया जा रहा है। कहते हैं कि यह गीत युवा श्रोताओं में लोकप्रिय हो रहे हैं। सच पूछिए तो इसमें आपत्ती की कोई बात नहीं है। गीत का मूल स्वरूप कायम रख, उसे नए परिवेश में पेश करना अच्छी बात है। एक कलाकार के नाते मैं भी यह मानती हूं कि कई गीत और कई धुनें ऐसी होती हैं, जिसे सुनकर हर कलाकार को लगता है कि काश इस गीत को गाने का मौका हमें मिलता। ऐसा लगना भी स्वाभाविक है, परंतु, गीत को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना सरासर गलत है। सुना है कि ऐसा आजकल खूब हो रहा है और इन गीतों के मूल रचनाकार के बदले किसी नए का नाम दिया जाता है, जो अत्यंत अयोग्य है। गाने की मूल धुन को बिगाडऩा, शब्दों में मनचाहा परिवर्तन करना या फिर नए और सस्ते शब्द जोडऩा इस तरह की बेतुकी हरकतें देख और सुन कर सचमुच मुझे बेहद पीड़ा होती है। किसी गीत को उसके मूल स्वरूप में पेश करना अच्छी बात है। ऐसा करने से मूल गीत की सुंदरता और उसका अर्थ कायम रहेगा। नई पीढ़ी को ऐसे गीत जरूर पसंद आएंगे। एक और बात कहती हूं जो शायद आप को दिलचस्प लगे। उस जमाने में तकनीक का पक्ष मजबूत नहीं था। मोम की रिकॉर्ड पर गाना ध्वनिमुद्रित किया जाता था। जरा सी भूल हो जाए तो वह रिकॉर्ड तोड़कर दूसरी बार गाना ध्वनिमुद्रित किया जाता था। पर हमारे गुणी वादक भाई और ,कौशिक जी मिनू कात्रक, भंसाली जी जैसे रिकार्डिस्ट पूरी कुशलता के साथ अपना काम करते थे। सुविधाओं का अभाव जरूर था, परंतु प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी। काम में लगन थी, प्रतिबध्दता की भावना थी। एक-एक गाने को खूब तराशा जाता था। कई दिन तक रिहर्सल होते थे। गाना सुंदर और अर्थपूर्ण हो इसलिए हर कोई हृदयपूर्वक कोशिश करता था। हर किसी पर सृजन का आशीर्वाद था। आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो सोचती हूं कि वह दिन अभिमंत्रित थे, वह समय जादुई था। आज भी हिंदी सिनेमा में कितने ही कवी-गीतकार, संगीतकार, गायक-गायिकाएं, रिकार्डिस्ट, और तंत्रविशारद पूरी मेहनत और लगन से काम कर रहे हैं और उनके काम को लोग सराह रहें हैं। अनगिनत गुणीजनों की प्रतिभा, तपस्या एवं मेहनत के फलस्वरूप हिंदी सिनेमा के गीत बने और बन रहे हैं। लोकप्रियता के शैलशिखर पर विराजमान हुए हैं और हो रहें हैं। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। मेरी प्रार्थना है, इस धरोहर के साथ खिलवाड़ न करें। संगीत यह समाज एवं संस्कृति का प्रथम उद्गार है। उसके साथ विद्रोह न करें। समस्त संगीतकार ,गीतकार और गायकों को मिलकर यह तय करना चाहिए की केवल लोकप्रियता पाने के लिए वह इस संगीत के खजानें का दुरुपयोग ना करें। मेरा मानना है कि हिंदी सिनेमा गीतों की पवित्रता कायम रखने का और यह पूरा मामला अच्छी तरह हल करने का दायित्व म्यूजिक कंपनियों का है। दु:ख इस बात का है कि कंपनीयां अपनी जिम्मेदारी भूल गई हैं। संगीत को केवल व्यावसायिक तौर पर देखने के बजाय देश की सांस्कृतिक धरोहर समझें। सभी से मेरा नम्र निवेदन है। स्वर्णिम युग के गीतों को बनाने में अनेक कलाकारों, गायक-गायिका, गीतकार, संगीतकार ,संगीत संयोजक एवं कुशल वादकों और तंत्रविशारदों की मेहनत लगी है। उस दौर में मधुर गीतों का एक जुलूस निकल पड़ा था। इस बात को हमें भूलना नहीं चाहिए कि अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अंबालेवाली, तलत महमूद साहब, शमशाद बेगम, मोहम्मद रफी साहब, मुकेश भाई, गीता दत्त, किशोर दा, मन्ना दा, आशा भोसले, उषा मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, येशुदास, एस.पी.बाला सुब्रमण्यम जैसे असंख्य गायक-गायिकाओं ने अपने गीतों से समूचे देश को एकता के धागे में पिरोने का काम किया है। दादासाहब फालकेजी ने भारतीय सिनेमा की नींव रखी। मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने इस देश के सामने स्वस्थ मनोरंजन का एक बढिय़ा जरिया प्रस्तुत किया। वी शांतारामजी ने प्रभात फिल्म कंपनी के माध्यम से सामाजिक सरोकारों का रुपहले पर्दे पर सशक्त चित्रण किया है। वहां कलकत्ते में देवकी बोस, नितिन बोस और कुंदनलालजी सहगल ने सिनेमा को एक निहायत ऊंचा दर्जा दिया है। महबूब खान, बिमल रॉय, के.आसिफ, चेतन आनंद, विजय आनंद, बी.आर.चोपड़ा, यश चोपड़ा, गुरूदत्त, राज कपूर, शक्ति सामंता, राज खोसला, नासीर हुसैन, हृषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार जैसे निर्माता-निर्देशकों ने भारत का वास्तविक, यथार्थ और मनलुभावन रूप दिखाया। उस दौर के हर निर्देशक की फिल्म में कहानी एवं गीतों का एक सुंदर ताना-बाना देखने को मिलता है। वह सभी गीत भारत के जनजीवन से जुड़ गए हैं। महाराष्ट्र में निर्देशक भालजी पेंढारकरजी ने श्री शिवाजी महाराजजी के जीवन एवं कार्य का निष्ठापूर्वक और सुंदर चित्रांकन कर मराठी लोकसंस्कृति में सिनेमा को प्रस्थापित किया। उनके फिल्मों से महाराष्ट्र की मिट्टी की खुशबू आती है। एस.एस.वासन, एल.वी. प्रसाद, एम.वी. रमण, ए.भीम सिंह जैसे स्वनाम धन्य फिल्मकारों ने दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों का निर्माण कर सिनेमा द्वारा देश में एकता कायम की जाती है इस सत्य को रेखांकित किया। मास्टर गुलाम हैदर, खेमचंद प्रकाश, अनिल विश्वास, आर.सी.बोराल, पंकज मलिक, के.सी.डे, नौशाद, सी.रामचंद्र, सज्जादजी, शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, मदनमोहन, रोशनलाल, हेमंतकुमार, सुधीर फडके, पं. हृदयनाथ मंगेशकर, वसंत देसाई, जयदेव, खय्याम, सलिल चौधरी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, जतीन-ललित जैसे अनगिनत प्रतिभाशाली संगीतकारों ने सुर, ताल और लय का अनुपम उत्सव रचा। हिंदी सिनेमा के गीतों को अमर बनाने में कवियों और शायरों का अमूल्य योगदान रहा है। साहिर लुधियानवी, मजरूह सुलतानपुरी, शैलेंद्र, राजेंद्र कृष्ण, पं. प्रदीप, पं. नरेंद्रजी शर्मा, पं. इंद्र, भरत व्यास, कैफी आजमी, हसरत जयपुरी, इंदिवर, राजा मेहंदी अली खान, गुलजार, नीरज, आनंद बक्षी, जावेद अख्तर जैसे अनगिनत कवियों ने सिनेमा-गीतों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और भारत की बुनियादी मूल्यों का भरपूर संवर्धन किया। कई हिंदी सिनेमा-गीतों की पंक्तियों को हमारे लोक जीवन में मुहावरों का दर्जा मिला है, यह बहुत बड़ी बात है।

 

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