क्या लिव-इन में रह रहीं महिलाओं को भी मिलते हैं पत्नी जैसे अधिकार?

पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने ऐसी महिलाओं और इनके बच्चों के लिए वित्तीय और दूसरे अधिकार सुनिश्चित किए हैं। महिलाओं को छह ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिनका सहारा वे अपनी आर्थिक, शारीरिक और मानसिक सुरक्षा के लिए ले सकती हैं।शादी में दरार पडऩे और तलाक होने के बाद महिलाओं के क्या अधिकार होते हैं, उनकी सही और पूरी जानकारी उन्हें आमतौर पर नहीं होती है। इसके चलते वे पार्टनर से अपना हक नहीं ले पाती हैं और अपने साथ बच्चों के लिए वित्तीय परेशानियां मोल लेती हैं। ऐसे में लोगों का यह सोचना आम है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहीं महिलाओं के पार्टनर से अलग होने के बाद उनकी हालत तो बदतर होती होगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने ऐसी महिलाओं और इनके बच्चों के लिए वित्तीय और दूसरे अधिकार सुनिश्चित किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशन को पांच कैटिगरी में डाला है – वयस्क और अविवाहित स्त्री-पुरुष के घरेलू संबंध, शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला (पुरुष के शादीशुदा होने की जानकारी स्त्री को हो) के संबंध, अविवाहित पुरुष और शादीशुदा महिला (स्त्री के शादीशुदा होने की जानकारी पुरुष को हो) के संबंध, शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला (जिसमें पुरुष के शादीशुदा होने की जानकारी स्त्री को नहीं हो) के संबंध और समलिंगी पार्टनर के लिव-इन रिलेशन।
स्त्री के वैवाहिक अधिकार
महिलाओं को छह ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिनका सहारा वे अपनी आर्थिक, शारीरिक और मानसिक सुरक्षा के लिए ले सकती हैं। इनमें उनके और उनके बच्चों के भरण-पोषण, वैवाहिक घर, स्त्री धन, मान मर्यादा के साथ रहने, समर्पित संबध और माता-पिता की संपत्ति में अधिकार शामिल हैं। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन 125 के तहत महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है। तलाक होने के बाद भरण-पोषण का अधिकार हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 (2) और हिंदू एडॉप्शन ऐंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956 में शामिल किया गया है। वहीं प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डॉमेस्टिक वायलंस एक्ट, 2005 के तहत महिलाओं को सभी तरह के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक शोषण के खिलाफ सुरक्षा दी जाती है।
लिव-इन में भरण-पोषण का अधिकार
मलिमथ समिति से 2003 में मिली सिफारिशों के बाद सेक्शन 125 को ष्टह्म्क्कष्ट में शामिल किया गया था। इसके तहत पत्नी का अर्थ बदला गया और उसमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को जोड़ा गया। अगर ऐसी महिलाएं अपने भरण-पोषण में असक्षम हैं तो उनकी वित्तीय जरूरतें उनके पार्टनर को पूरी करनी होगी। रिश्ते में खटास आने के बाद भी लिव इन पार्टनर को उनके फाइनैंस का ख्याल रखना होगा। इसी तरह डॉमेस्टिक वायलेंस एक्ट में शादीशुदा महिलाओं के बराबर लिव-इन में रह रहीं महिलाओं को रखा गया है।
संपत्ति पर अधिकार
हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956, को 2005 में संशोधित करके महिलाओं को पैरेंटल प्रॉपर्टी पर अधिकार दिया गया था। बेटियां, अविवाहित हों या शादीशुदा, माता-पिता की पुश्तैनी और अपनी खरीदी प्रॉपर्टी पर बेटों के बराबर हक होगा। पुश्तैनी जमीन जायदाद पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार होगा। पैरंट्स की अपनी खरीदी प्रॉपर्टी में उन्हें वसीयत के मुताबिक हिस्सा मिलेगा।
विरासत पर बच्चों का हक
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि अगर स्त्री-पुरुष लंबे समय तक साथ रहते हैं तो उनके संबंधों से होनेवाले बच्चे वैध माने जाएंगे। पर्सनल लॉ में ऐसे बच्चों को भरणपोषण का अधिकार नहीं दिया गया है, लेकिन ष्टह्म्क्कष्ट के सेक्शन 125 में उनके हितों को सुरक्षा दी गई है। जहां तक प्रॉपर्टी राइट्स की बात है, हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 16 के तहत इन बच्चों को वैध माना जाता है। पुश्तैनी और पेरंट्स की अपनी खरीदी प्रॉपर्टी के वे कानूनी उत्तराधिकारी होते हैं। हालांकि, सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी की गाइडलाइन के तहत लिव-इन कपल बच्चे गोद नहीं ले सकते।

 

 

 

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