इंटरनेट और टेक्नॉलजी की देन हैं ये मानसिक बीमारियां

 

पिछले कई दशकों में तकनीक के क्षेत्र में हुई उन्नति जहां एक और वरदान की तरह है वहीं दूसरी ओर इसके कई नुकसान भी हैं और ये नुकसान ऐसे हैं जिन्हें हम हल्के में नहीं ले सकते। अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसी एक नहीं बल्कि कई मानसिक बीमारियों का पता लगाया है जिनके पीछे की वजह इंटरनेट और टेक्नॉलजी का बढ़ता इस्तेमाल है। आगे की तस्वीरों में जानें, कौन सी हैं वो बीमारियां जो इंटरनेट और तकनीक की देन हैं और कहीं आप भी नहीं हैं इन बीमारियों का शिकार….

सेल्फी की सनक- सेल्फाइटिस

साल 2014 में इसकी शुरुआत ऑनलाइन जोक के तौर पर हुई थी जब अमेरिकन साइकायट्रिक असोसिएशन ने सेल्फाइटिस को नया मनोविकार बताया था उन लोगों के लिए जो जरूरत से ज्यादा सेल्फी खींचते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्त करते हैं। साल 2017 आते ही यह बात साबित भी हो गई है कि सेल्फाइटिस एक मानसिक बीमारी है। इंटरनैशल जर्नल ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड अडिक्शन में छपी स्टडी में सेल्फी के लिए सनकी कई प्रतिभागियों को शामिल किया गया था जिन्हें सेल्फाइटिस बिहेवियर स्केल पर ग्रेड दिया गया। स्टडी में शामिल प्रतिभागियों में से 25 प्रतिशत को क्रॉनिक, 40.5 प्रतिशत को अक्यूट और 34 प्रतिशत को बॉर्डरलाइन सेल्फाइटिस की श्रेणी में रखा गया था।

फोन बजने का भ्रम- फैंटम रिंगिंग सिंड्रोम

क्या आपको भी बार-बार लगता है कि आपके फोन की घंटी बज रही है और जब फोन के पास जाते हैं तो पता चलता है कि कोई कॉल नहीं आ रही? ऐसे में लोग इसे अपना भ्रम मानकर नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन ये मानसिक समस्या का संकेत है। इस बीमारी को नाम दिया गया है ‘फैंटम वाइब्रेशन या फैंटम रिंगिंग सिंड्रोम’। हालांकि यह कोई गंभीर समस्या नहीं है लेकिन समय रहते इसका इलाज नहीं करवाया गया तो आगे चलकर ये भयानक रूप ले सकती है। साथ ही इस पर अधिक शोध नहीं हुए हैं लेकिन मनोवैज्ञानिकों ने इसके कई कारण बताए हैं। द्बस्रद्बह्यशह्म्स्रद्गह्म् के ऑथर डॉ लैरी रोसेन के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल करने वाले 70 प्रतिशत लोग फैंटम रिंगिंग यानी इस भ्रम का शिकार होते हैं जिसमें उन्हें महसूस होता है कि उनका फोन बज रहा है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता।

गूगल इफेक्ट से खतरे में अस्तित्व

हमारे आम जनजीवन में सर्च इंजेन्स का महत्व कितना बढ़ गया है इसका पता इस बात से ही चलता है कि किसी भी सामाजिक समारोह में जब कुछ लोग बातचीत या चर्चा शुरू करते हैं तो उसकी पहली लाइन होती है- जब कल मैं गूगल कर रहा था/थी… गूगल यह शब्द संज्ञा से क्रिया बन गया है जिसका अर्थ है- ऑनलाइन किसी चीज को सर्च करना। इससे इंसानों पर यह असर पड़ा है कि हमारे मस्तिष्क ने कम से कम जानकारियां रखना शुरू कर दिया है क्योंकि उसे पता है कि हमें जो भी जानकारी चाहिए वह महज एक क्लिक दूर है। एक तरफ जहां यह बड़ा वरदान है वहीं, इसकी वजह से इंसान धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहा है।

फोन खोने का डर- नोमोफोबिया

टेक्नोलोज़ी के बढ़ते इस्तेमाल ने मानवीय जीवन को सुगम बनाने के साथ साथ कई तरह की मानसिक समस्याएं हमें सौगात में दी है और इन्हीं में से एक है- नोमोबिया। इसमें पीडि़त व्यक्ति को अपने मोबाइल फोन के गुम हो जाने का भय रहता है और वह भी इस कदर कि ये लोग जब टॉइलट भी जाते हैं तो अपना मोबाइल फ़ोन साथ लेकर जाते हैं और दिन में औसतन 30 से अधिक बार ये लोग अपना फोन चेक करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हम में से करीब 66 प्रतिशत लोग नोमोफोबिया से पीडि़त हैं।

 

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