ट्रेड वॉर से मंदी आई तो भारत पर मामूली असर होगा-डेलॉयट

नई दिल्ली । देश के ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट (जीडीपी) में एक्सपोर्ट सेक्टर के कम योगदान, युवाओं की अधिक आबादी, हाई कमोडिटी इंपोर्ट और रिफॉर्म समर्थक सरकार के चलते ग्लोबल इकनॉमिक स्लोडाउन यानी वैश्विक आर्थिक सुस्ती से भारत को बचने में मदद मिलेगी। डेलॉयट ने यह बात कही है। उसने कहा कि ट्रेड वॉर के बढऩे से वैश्विक ग्रोथ में कमी आने की आशंका जताई जा रही है। डेलॉयट टूश तोमात्सु के चीफ ग्लोबल इकनॉमिस्ट इरा केलिश ने इकनॉमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत के साथ कई अच्छी बातें हैं, जिनका लॉन्ग टर्म में उसे लाभ मिलेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर वैश्विक मंदी आती है तो भारत उसके असर से बचा नहीं रह पाएगा। उन्होंने कहा कि अगर चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था सुस्त होती हैं तो उसका भारत पर कुछ बुरा असर हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि संरक्षणवाद के और बढऩे पर वैश्विक सुस्ती आ सकती है। अमेरिका और चीन अभी ट्रेड वॉर में उलझे हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने सोमवार को जारी अपनी हालिया रिपोर्ट में भारत की ग्रोथ पर इसके असर को शामिल किया था। उसने 2019 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 0.10 पर्सेंट घटाकर 7.3 पर्सेंट और 2020 के लिए 0.30 पर्सेंट कम करके 7.5 पर्सेंट कर दिया है। आईएमएफ ने इस रिपोर्ट में कच्चे तेल के दाम में तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और ट्रेड वॉर के असर को शामिल किया है। केलिश ने कहा कि व्यापार को लेकर तनाव बढऩे पर अगर चीन के हाथ से कुछ बाजार निकलता है तो भारत के लिए कुछ मौके बन सकते हैं। भारत के लिए अच्छी बात यह भी है कि इसकी अर्थव्यवस्था में निर्यात क्षेत्र की भागीदारी अधिक नहीं है। यह दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स (उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं) की तुलना में कम है। केलिश ने बताया, ‘अगर दुनिया की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ती है तो कमोडिटी के दाम में कमी आएगी। इससे तेल भी सस्ता होगा। यह भारत के लिए फायदे की बात होगी क्योंकि वह कमोडिटी का नेट इंपोर्टर है।Ó इस मामले में वह दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स से अलग है। 2017 में भारत फ्रांस को पीछे छोड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी इकनॉमी बन गया था। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, पिछले साल भारत का जीडीपी 2.59 लाख करोड़ डॉलर रहा। इस साल भारत ब्रिटेन को पीछे छोड़कर 5वीं सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था बन सकता है। अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरों पर केलिश ने कहा कि विदेशी निवेश बाहर जाने पर रुपये में गिरावट की आशंका हमेशा बनी रहेगी, लेकिन इसमें तेज गिरावट नहीं आएगी। उन्होंने बताया कि विदेशी निवेशक भारत में भ्रष्टाचार, अक्षमता, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और मुश्किल नियम-कायदों को लेकर चिंतित हैं।

 

 

 

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