केंद्र ने ही कमजोर किया बैंकों में ऑडिट की व्यवस्था

नई दिल्ली। पीएनबी घोटाला सामने आने के बाद ऑडिट में ढिलाई की शिकायतों पर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने ही बैंक ऑडिट व्यवस्था और ऑडिटर नियुक्त करने की भारतीय रिजर्व बैंक की शक्तियों को कमजोर किया। उन्होंने सवाल उठाया कि वैधानिक ऑडिट के लिए ऑडिटर नियुक्त करने के लिए बैंक प्रबंधन को अनुमति क्यों दी गई।एसोसिएशन ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के महासचिव किंशुक दत्ता ने संवाददाताओं को बताया कि पहले बैंकों के वैधानिक ऑडिटर की नियुक्ति आरबीआई की ओर से की जाती थी। 2014-15 से नियुक्ति का आरबीआई का अधिकार केंद्र सरकार ने खत्म कर दिया और बैंकों के प्रबंधन को ऑडिटर चुनने का अधिकार दे दिया।फोरम ऑफ फाइनेंस प्रोफेशनल्स एंड इकोनॉमिस्ट्स के महासचिव सुनील कुमार गांधी ने कहा कि बैंकों के प्रबंधन को वैधानिक ऑडिट के लिए ऑडीटर चुनने का अधिकार दे दिया गया। नियुक्ति से पहले उन्हें सिर्फ आरबीआई की अनुमति लेनी होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी परीक्षार्थी को ही अपने लिए परीक्षक नियुक्त करने का अधिकार दे दिया जाए।उन्होंने मांग की कि बैंकों के सेंट्रल ऑडिटर और शाखाओं के वैधानिक ऑडीटर को नियुक्त करने का अधिकार आरबीआइ को दिया जाना चाहिए, न कि बैंकों के प्रबंधन को। उन्होंने आशंका जताई कि अगर ऑडिटर नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था जारी रही तो किसी बैंक के प्रबंधन और चयनित ऑडिटर के बीच सांठगांठ हो सकती है। वित्त मंत्रालय के 26 सितंबर 2012 के एक सर्कुलर की आलोचना करते हुए दत्ता ने कहा कि मंत्रलय ने बैंकों को निर्देश दिया था कि कोर बैंकिंग सोल्यूशन लागू होने के बाद बैंक शाखाओं का ऑडिट प्रभावी नहीं रह गया है, यह प्रक्रिया रुटीन बन चुकी है। शाखाओं का वैधानिक ऑडिट अनिवार्य है लेकिन दुर्भाग्यवश ऑडिट के लिए 20 करोड़ रुपए से कम कर्ज वाली शाखाओं को नहीं चुना जाता है।

 

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