कड़ाके की ठंड में अधिक रहता है हाइपोथर्मिया का खतरा

 

हाइपोथर्मिया यानी शरीर का तापमान सामान्य से नीचे चला जाना। सर्दियों में इसका जोखिम अधिक रहता है। कड़ाके की ठंड के दौरान जो लोग खुद का ध्यान नहीं रखते हैं, उनके शरीर का तापमान सामान्य यानी 35 डिग्री से कम हो जाता है। यह स्थिति बहुत घातक हो सकती है और जान भी जा सकती है। इस बीमारी को लो बॉडी टेम्परेचर (शरीर का कम तापमान) भी कहते हैं। वैसे भी उत्तर भारत में इन दिनों ठंड बढ़ रही है। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी शुरू हो गई है, ऐसे में खुद का ध्यान रखने की जरूरत है।

हाइपोथर्मिया के कारण

– सर्दियों में गर्म कपड़े पहने बिना बाहर रहना
– झील, नदी या पानी के किसी अन्य स्रोत के ठंडे पानी में गिरना
– हवा या ठंड के मौसम में गीले कपड़े पहनना
– भारी परिश्रम करना, पर्याप्त तरल पदार्थ नहीं पीना, या ठंड के मौसम में पर्याप्त खाना नहीं खाना।
हाइपोथर्मिया के लक्षण
जैसे ही कोई मरीज हाइपोथर्मिया की गिरफ्त में आता है, उसके सोचने और हिलने-डुलने की क्षमता चली जाती है। कई बार मरीज यह नहीं समझ पाता कि वह हाइपोथर्मिया के कारण इमरजेंसी की स्थिति में चला गया है। इसके लक्षणों में शामिल हैं
– लगातार नींद आना या हमेशा सुस्ती बनी रहना
– हमेशा कमजोरी बनी रहना
– रूखी त्वचा
– दिमाग नहीं चलना, हमेशा उलझन बनी रहना
– लगातार कंपकंपी (शरीर का तापमान बेहद कम होने से कांपना बंद हो सकता है।)
– सांस लेने में तकलीफ या धड़कनों में उतार-चढ़ाव
– हाइपोथर्मिया के कारण कार्डियक अरेस्ट, शॉक और कोमा की स्थिति बन सकती है। इसलिए कोई भी लक्षण मिलने में- तत्काल इलाज करना चाहिए।
हाइपोथर्मिया में क्या करें और क्या न करें
यदि व्यक्ति बेहोश है, तो उसकी श्वास और ब्लड सर्कुलेशन की जांच करें। यदि आवश्यक हो, तो सीपीआर दें यानी उसके मुंह में मुंह डालकर हवा भरें। यदि पीडि़त प्रति मिनट 6 से कम सांस ले रहा है, तो समझें कि खतरा है। व्यक्ति को गर्म कमरे में ले जाएं और गर्म कंबल ओढ़ा दें। यदि घर के अंदर जाना संभव नहीं है, तो उसे ठंडी हवा से बचाएं और कंबल का उपयोग करें। गीले कपड़े पहने हैं तो उन्हें हटा दें। शरीर को गर्म रखने के लिए पूरे शरीर और खासतौर पर सिर और कान को कवर करें। गर्दन, छाती और कमर पर गर्म सेक करें। यदि व्यक्ति होश में है तो गर्म चाय या कॉफी दें दें।
जिंदगी में मकसद रखने वाले लोगों की सेहत रहती है अच्छी-जिन लोगों की जिंदगी में मकसद होता है उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। एक हालिया शोध में बताया गया है कि जब लोग 60 साल की उम्र को पार करने लगते हैं तो संबंधों में बदलाव होने लगता है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार जिनकी जिदगी में मकसद और ध्येय होता है उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वे लंबा जीवन जीते हैं।
ऐसे किया शोध -शोधकर्ताओं ने 1042 वयस्कों के डाटा का विश्लेषण किया। इस शोध में शामिल प्रतिभागियों की उम्र 21 से लेकर 100 साल के बीच में थी। शोधकर्ताओं ने इन प्रतिभागियों के जीवन के मकसद और ध्येय को जानने की कोशिश की। इंटरव्यू और प्रश्नोत्तरियों के द्वारा उन्होंने प्रतिभागियों से दो सवालों- मैं अपने जीवन में एक उद्देश्य या मिशन की तलाश कर रहा हूं और मैंने अपने जीवन में एक संतुष्ट करने वाले मकसद की तलाश कर ली है, के बारे में अपने निजी तर्क देने को कहा। जर्नल ऑफ क्लीनिकल साइकाइट्री में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि जिन लोगों के जीवन में एक मकसद होता है वे उन लोगों की तुलना में ज्यादा खुश और स्वस्थ होते हैं जिनके जीवन में कोई मकसद नहीं होता। मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है – शोधकर्ताओं के अनुसार जिन लोगों के जीवन में मकसद होता है उनका शारीरिक और मानिसक स्वास्थ्य बेहतर होता है जबकि जो लोग जीवन के मकसद की तलाश में होते हैं उनका मानिसक स्वास्थ्य और बुद्धमत्ता सबसे खराब स्थिति में होती है। शोधकर्ता दिलीप वी जेस्टे ने कहा, जब आप अपर्नी जिंदगी के मतलब को ज्यादा समझने लगते हैं तो आप ज्यादा संतुष्ट महसूस करते हैं। वहीं, अगर आपर्की जिंदगी में कोई लक्ष्य नहीं है और आप उसकी तलाश बिना मन के कर रहे हैं तो आप असफल हो जाएंगे और बहुत ज्यादा तनाव महससू करेंगे।शोधकर्ताओं ने देखा कि 60 की उम्र में जीवन में मतलब होने का स्तर ऊंचा चला गया और मतलब की तलाश में कमी आई। जेस्टे ने कहा, जब आप युवा होते हैं, जैसे आप 20 साल की उम्र में होते हैं तो आप अपने करियर को लेकर और जीवनसाथी को लेकर अनिश्चित होते हैं।  आपको पता नहीं होता कि एक इंसान के तौर पर आप कहां आकर खड़े होंगे। उस वक्त आप अपनी जिंदगी के मतलब की तलाश करते हैं। जैसे ही आप अपने जीवन के तीसरे, चौथे और पांचवें दशक में प्रवेश करते हैं आप पहले से कहीं ज्यादा स्थाई होते हैं।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *