स्मार्टफोन की लत किशोरों के मस्तिष्क को कर रही प्रभावित

नई दिल्ली। तकनीक के इस दौर में हर कोई स्मार्टफोन पर निर्भर हो गया है। आज एक बच्चे के पास खुद का मोबाइल फोन होने की औसत उम्र भी 10 साल हो गई है। इसमें कोई दोराय नहीं कि स्मार्टफोन आज जरूरत से लत में तब्दील होता जा रहा है। लेकिन, एक हालिया अध्ययन के नतीजे और भी चिंता वाले हैं। अध्ययन के अनुसार, तकनीक पर इस कदर बढ़ती निर्भरता किशोरों के मस्तिष्क को प्रभावित कर रही है। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जिन किशोरों को स्मार्टफोन की लत लग चुकी है, उन्हें अवसाद, चिंता समेत तमाम मेंटल डिसऑर्डर की समस्या हो सकती है। सिओल के कोरिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अध्ययन में स्मार्टफोन एवं इंटरनेट की लत के शिकार किशोरों के मस्तिष्क में रसायनिक असंतुलन पाया है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन और इंटरनेट के लती 19 युवाओं का ब्रेन स्कैन किया। फिर 19 ऐसे युवाओं के मस्तिष्क से उसकी तुलना की, जिनका मस्तिष्क नियंत्रित एवं स्वस्थ्य था। स्मार्टफोन की लत के शिकार 12 प्रतिभागियों को नौ सप्ताह तक संज्ञानात्मक व्यवहारिक थैरेपी दी गई। मोबाइल फोन की लत की तीव्रता को मापने के लिए प्रतिभागियों ने एक टेस्ट भी पूरा किया। अध्ययन के मुख्य लेखक प्रोफेसर हूंग सुक सिओ का कहना है कि ‘ टेस्ट के दौरान जिस प्रतिभागियों का स्कोर अधिक था, उनकी स्मार्टफोन के प्रति लत भी अधिक थी। अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि स्मार्टफोन के लती किशोरों में सामान्य किशोरों की अपेक्षा तनाव, अवसाद, चिंता, व्याकुलता, आवेग का स्कोर अधिक पाया गया।मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन: स्मार्टफोन की लत के शिकार किशोरों के ब्रेन स्कैन के दौरान वैज्ञानिकों ने ऐसे रासायन का असंतुलन पाया गया, जो मस्तिष्क की क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। हालांकि, ज्ञानात्मक व्यवहारिक थैरेपी के बाद यह रसायन दोबारा संतुलित हो गए।ब्रेन स्कैन में गामा-अमिनोबूट्रिक एसिड (त्र्रक्च्र) का स्तर भी पता चला। यह एक रसायन है, जो ब्रेन के सिगनल्स को धीमा कर देता है।अध्ययन के परिणाम में लती किशोरों में त्र्रक्च्र का स्तर अधिक पाया गया। इससे स्पष्ट है कि यह कैमिलकर स्मार्टफोन की लत से जुड़ा हुआ है। संज्ञानात्मक व्यवहारिक थैरेपी के बाद वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों मे इस रसायन को बढ़ा हुआ पाया।

 

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