क्योंकि बादशाह से उम्मीदें भी किंग साइज होती हैं!

 

क्योंकि बादशाह से उम्मीदें  भी किंग साइज होती हैं!
बॉलिवुड की खान त्रिवेणी शाहरुख, आमिर, सलमान की फिल्मों को लेकर सिनेप्रेमियों में अलग ही उत्साह रहता है। हालांकि, इस साल रिलीज हुई इन तीनों सुपरस्टार्स की फिल्मों रेस 3, ठग्स ऑफ हिंदोस्तान और जीरो ने फैंस का दिल बुरी तरह तोड़ा है। बॉलिवुड के बादशाह का खिताब हासिल करने वाले शाहरुख खान की तो पिछली कई फिल्में दिलवाले, फैंस, जब हैरी मेट सेजल दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। पिछले तीन सालों में एक रईस के ठीकठाक प्रदर्शन के अलावा, शाहरुख की किसी फिल्म ने उनके स्टारडम के मुताबिक बॉक्स-ऑफिस बिजनस नहीं किया। जीरो से तो सबको कुछ ज्यादा ही उम्मीदें थीं। कहा जा रहा था कि जीरो शीर्षक वाली यह फिल्म शाहरुख को फिर से सबका हीरो बना देगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर भी जीरो ही साबित हुई। नतीजतन, अब शाहरुख के स्टारडम पर सवाल खड़े होने लगे हैं। बहुतों का कहना है कि उनका वक्त अब खत्म हो गया, उनका स्टारडम पहले जैसा नहीं रहा, वगैरह-वगैरह। लेकिन, यह भविष्यवाणी करने वालों को याद रखना चाहिए कि मायानगरी में एक ही चीज निश्चित है, वह है अनिश्चितता। बेशक, शाहरुख की पिछली कई फिल्में फ्लॉप रही हों, लेकिन कौन जानता है कि अगली फिल्म क्या कमाल दिखा दे और आप फिर उनके गुणगान करने लगे। सैफ अली खान का उदाहरण देख लीजिए, अपने करियर के शुरुआत से करीब एक दशक तक सैफ को कभी कामयाब ऐक्टर्स में नहीं गिना गया। जब उनका करियर लगभग खत्म मान लिया गया था और वे रहना है तेरे दिल में और न तुम जानो न हम जैसी फिल्मों में सपोर्टिंग ऐक्टर का रोल करने लगे थे, तभी उनकी सपोर्टिंग ऐक्टर वाली फिल्मों दिल चाहता है और कल हो न हो ने उन्हें चौथा खान बना दिया था।लेकिन यह भी सच है कि इसके लिए शाहरुख को कहीं न कहीं यह सोचना होगा कि वे कहां गलत जा रहे हैं? देखा जाए, तो इंडस्ट्री में पच्चीस साल बिता चुके शाहरुख अब अपने भीतर के नए कलाकार को खोजते नजर आ रहे हैं। फैन में डबल रोल, रईस में शराब व्यवसायी, डियर जिंदगी में मनोवैज्ञानिक, जीरो में बौने के किरदार के जरिए अपनी स्थापित राहुल-राज वाली छवि को तोडऩे की उनकी कोशिश दिख रही है। यही नहीं, वे अपने फेवरिट करण जौहर-आदित्य चोपड़ा क्लैन से बाहर आकर इम्तियाज अली, आनंद एल राय जैसे निर्देशकों के साथ नई जुगलबंदी भी कर रहे हैं।बावजूद इसके, वे अपनी उस पुरानी राहुल-राज वाली छवि को तोड़ नहीं पा रहे हैं। जब हैरी मेट सेजल का हैरी हो या जीरो का बउआ सिंह, शाहरुख अपनी हर फिल्म में शाहरुख ही लगते हैं। अब यह शाहरुख का ऑरा है या अपने लॉयल फैंस को खुश रखने की कोशिश कि वह हर किरदार में अपने चिरपरिचित रोमांटिक अवतार, ओवर द टॉप ऐक्टिंग, बाहें फैलाने, नाच-गाने से आगे नहीं निकल पाते। और तो और, इम्तियाज अली, आनंद एल राय जैसे निर्देशकों की अलहदा स्टाइल का रंग भी शाहरुख पर चढ़ता नहीं दिखता, उल्टे ये निर्देशक खुद किंग खान के रंग में रंगे नजर आते हैं। जीरो के बउआ सिंह का ही उदाहरण लीजिए, वह बेशक बौना है, लेकिन डीडीएलजे के राज और कुछ कुछ होता है के राहुल की तरह ही पैसेवाले बाप का ओवरकॉन्फिडेंट औलाद है, जो वैसे ही रोमांटिक गाने गाता है, लड़की को इंप्रेस करता है और उसके लिए चांद के बजाय मंगल ग्रह तक जा पहुंचता है।शाहरुख को यह समझना होगा कि अब ऑडियंस वह पंद्रह साल पहले वाली नहीं रही, जो महज उनके डिंपल्स पर मर मिटती थी और बाहें फैलाने पर दौड़ते हुए थिएटर तक आ पहुंचती थी। यह दिल मांगे मोर वाली पब्लिक है, जिसके पास दुनिया के ओर-छोर का एंटरटेनमेंट एक क्लिक पर मौजूद है। ऐसे में उनकी जेब से अपनी फिल्म के टिकट के तीन-चार सौ रुपये निकलवाने के लिए आपको बड़े बजट, बड़ा बैनर, नामी स्टार, नामी डायरेक्टर के बजाय एक बेहतरीन कहानी तलाशनी होगी, क्योंकि बॉलिवुड के बादशाह से फैंस की उम्मीदें भी किंग साइज होती हैं।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *