जूते चलें सेहत की चाल


जब तक पैर शिकायत ना करने लगें, जूते-चप्पल खरीदते समय फैशन व स्टाइल पर ही ज्यादा नजर रहती है। शोध कहते हैं कि सही फुटवियर का चुनाव ना करना पैरों में दर्द के साथ-साथ चोटिल होने की आशंका बढ़ा देता है। कैसे करें सही फुटवियर का चुनाव, बता रही हैं शमीम खान जूता या चप्पल सुविधाजनक नहीं है तो चाल बदलने में देर नहीं लगती। ब्रिटेन के कॉलेज ऑफ पोडियाट्री में हुए एक शोध के अनुसार असुविधाजनक जूते-चप्पल पहनने के केवल एक घंटा छह मिनट में ही हमें दर्द महसूस होने लगता है। मांसपेशियों में खिंचाव आता है। एडिय़ों व पिंडलियों में दर्द होने लगता है। और ऐसा केवल ऊंची एड़ी के जूते-चप्पल पहनने से नहीं होता।लंबे समय तक गलत जूते-चप्पल पहनना भी पैरों में स्थायी विकृति का कारण बन सकता है। इससे पैरों, पंजों, घुटनों, कूल्हों और कमर में दर्द की समस्याएं बढऩे लगती हैं। किस तरह के जूते-चप्पल सही रहेंगे, यह इस पर भी निर्भर करता है कि पैरों का आकार कैसा है? तलवे सपाट हैं, गोलाई सामान्य है या अधिक गोलाई है। सपाट पैर के लिए स्थिर जूते-चप्पल तो तलवों में गोलाई ज्यादा होने पर गद्देदार बेस वाले फुटवियर पहनने चाहिए। ऐसे हों फुटवियर : जूते या चप्पल का आरामदायक होना सबसे पहली शर्त है, जिसके लिए सही नाप होना जरूरी है। अच्छे किस्म के जूते-चप्पलों में कुशन बेस होता है और वे पैरों की गोलाई के अनुरूप होता है। जूते या चप्पल का सोल मुलायम और लचीला होना चाहिए। अगर चलने का काम अधिक है तो सही नाप वाले जूते या चौड़े पट्टे वाले सैंडल पहनें। ये पैरों का संतुलन बनाए रखते हैं। छोटे आकार के फुटवियर पहनने से एडिय़ों और उंगलियों को कुशन नहीं मिलता। पूरी तरह सपाट जूते-चप्पल पहनने की बजाय 1-1.5 से.मी. की हील पहनें। इससे पैरों को बेहतर संतुलन और सहारा मिलता है। इन बातों का भी रखें ध्यान-एक ही तरह के फुटवियर को लगातार 4-5 दिन पहनने से बचें। अदल-बदल कर पहनने से किसी एक ही मांसपेशी या जोड़ पर अधिक दबाव नहीं पड़ता। जूते हमेशा दोपहर में खरीदें। इस समय पैरों का आकार अधिकतम होता है। बंद जूता या चप्पल खरीद रहे हैं तो सबसे बड़ी उंगली और जूते के बीच आधे सेंटीमीटर की खाली जगह जरूर रखें। फ्लैट हील्स: अमेरिकन पोडियाट्रिक मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार, यह भ्रम है कि सपाट तले वाले जूते या चप्पल पैरों के लिए अच्छे होते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। अगर थोड़ा चलना है तो फ्लिप-फ्लॉप्स या फ्लैट हील्स सही हैं, पर उनमें भी सोल सख्त नहीं होना चाहिए। फ्लिप-फ्लॉप्स, बैलेरिना और फ्लैट हील्स आदि के बढ़ते चलन के कारण पिछले 10 से15 साल में प्लांटर फैसिटिस के मामले सात गुना बढ़े हैं।
नुकसान: फ्लैट हील्स में फ्लिप-फ्लॉप्स सबसे अधिक चलन में हैं। फ्लिप-फ्लॉप्स से पैरों की गोलाई को सहारा नहीं मिलता, जो प्लांटर फैसिटिस और एचिलीस टेन्डिनिटिस का कारण बन जाता है। प्लांटर फैसिटिस के कारण एडिय़ों में दर्द व सूजन हो जाती है। एचिलीस टेन्डिनिटिस में पैर के ऊतकों में खिंचाव आने लगता है, जिससे लंबे समय बाद हैमर टो की समस्या हो जाती है यानी उंगली हथौड़े की तरह अंदर मुड़ जाती है। कारण कि पकड़ बनाए रखने के लिए पैरों की उंगलियों को अंदर की ओर मोडऩा पड़ता है। फ्लैट हील्स की पैरों पर पकड़ नहीं होती, उंगलियों को पकड़ बनानी होती है। इनमें झटके से बचाने वाला शॉक एब्जॉर्बिंग मैटीरियल नहीं होता। इससे लिगामेंट्स व मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है। टिप्स : सही नाप और मोटे सोल वाले फ्लिप-फ्लॉप्स खरीदें। पट्टे वाली चप्पल पहनें। आगे से संकरी व सख्त बेस वाली बैलेरिना न पहनें। कुशन बेस रखें। कोल्हापुरी: कोल्हापुरी चप्पलें और मोजडिय़ां अच्छी लगती ही हैं। महिलाएं और पुरुष दोनों पहनते हैं। चूंकि आगे से पूरी खुली होती हैं, इसलिए जिन्हें बनियन (पैर के अंगूठे के जोड़ पर कड़ा गूमड़) है या उंगलियां टेढ़ी हैं, उनके लिए अच्छी रहती हैं। इनमें आधा से.मी. का कुशन हो तो सही रहता है। नुकसान कोल्हापुरी का सोल बहुत सख्त होता है। यह बिल्कुल सपाट होती हैं। जिनकी पिंडलियां सख्त हंै या पैरों में दर्द रहता है, उन्हें पहनने से बचना चाहिए।
टिप्स
मोटे सोल वाली कोल्हापुरी खरीदें।
कभी-कभी पहनें।
कोल्हापुरी चप्पलों का तला घिसने पर उन्हें ना पहनें।
स्पोर्ट्स शूज खरीदें तो …
खेलों की विभिन्न गतिविधियों के लिए अलग शूज होते हैं। स्पोर्ट्स शूज में शॉक एब्जॉर्बर लगे होते हैं। ये खेल के दौरान पैरों को सहारा देने के साथ-साथ चोटिल होने से बचाते हैं। पैरों की मांसपेशियों पर दबाव कम पड़ता है। गलत स्पोर्ट्स शूज पहनने से पैरों व एड़ी में दर्द के साथ स्ट्रेस फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।
इनकी बनावट ऐसी होनी चाहिए, जिससे पंजों को क्षति न पहुंचे। पंजों के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए। बेस कुशन वाला होना चाहिए। पतले सोल वाले स्पोट्र्स शूज से पैरों में चोट लगने का खतरा बढ़ जाएगा।
स्पोट्र्स शूज हल्के वजन के होने चाहिए। जैसे ही जूतों की हील और मिड सोल खराब होने लगे, तभी जूते बदल दें। आमतौर पर इनका जीवन 500 मील का होता है।
अच्छी कंपनियां जूते बनाते समय काफी शोध करती हैं। संभव हो तो ब्रांडेड जूते लें।
विशेषज्ञ: डॉ. प्रदीप मुनोट, ऑर्थोपेडिक सर्जन, फुट एंड एंकल स्पेशलिस्ट, ब्रीच केंडी हॉस्पिटल, मुंबई।
डॉ. अनिल अरोड़ा, हेड ऑफ डिपार्टमेंट, आर्थोपेडिक्स एंड ज्वाइंट रिप्लेसमेंट, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली।
प्वाइंटेड टो-शूज: ये आगे की ओर से तंग होते हैं। स्टाइलिश लगते हैं, पर नुकसान पंजों को भुगतना पड़ता है। इतनी चौड़ाई अवश्य होनी चाहिए कि पैरों की उंगलियों को जरूरी स्थान मिले। पर यह बनियन की समस्या को गंभीर कर देते हैं। आगे से नुकीले फुटवियर ऊंची एड़ी के हैं तो समस्या और गंभीर हो जाती है। पैरों की उंगलियां सिकुड़कर स्थायी रूप से अंदर मुड़ जाती हैं। इसे हैमर टो कहते हैं। हैमर टो का उपचार कराना जरूरी होता है। इन्हें कभी-कभी कम देर के लिए ही पहनें। आर्थोपेडिक फुटवियर्स या डॉक्टर्स सोल वाले फुटवियर पैरों के अलाइनमेंट को ठीक रखते हैं। अगर एडिय़ों में दर्द है तो इनसे आराम मिलता है, पर फ्लैट फुट है, तलवे की गोलाई ज्यादा है, उंगलियों और पैरों में दर्द है तो सामान्य डॉक्टर सोल से लाभ नहीं होगा। अगर मंहगे ऑर्थोपेडिक फुटवियर ले रहे हैं तो पहले डॉक्टर से सलाह लें।
हाई हील्स: ऊंची एड़ी पहनने का कोई फायदा नहीं है। इन्हें थोड़ी देर के लिए ही पहनें। आधा या एक इंच हील पहनने से नुकसान नहीं होता, पर लंबे समय तक ऊंची हील पहनना पैरों में स्थायी विकृति ला देता है। इससे एचिलीस टेंडन कड़े और छोटे हो जाते हैं। ऊंची एड़ी के कारण पैरों की जो बॉल होती है, उस पर अधिक दबाव बनता है। एक इंच की हील इस दबाव को 22त्न, 2 इंच की हील इसे 57त्न और 3 इंच की हील इस दबाव को 76त्न तक बढ़ा देती है। 3-4 इंच की हील पैर का अलाइनमेंट बदल सकती है, जिससे पैरों, कूल्हों और कमर पर दबाव पड़ता है। शरीर का संतुलन बनाने में भी समस्या आती है।
टिप्स: लगातार चार घंटे से अधिक ऊंची एड़ी के जूते-चप्पल ना पहनें। हाई हील्स पहननी ही हैं तो पैरों की मालिश करें।
अलग-अलग आकार के हील्स वाले फुटवियर पहनते रहें। इससे पैरों की मांस-पेशियां एक ही स्थिति में नहीं रहेंगी। अच्छे ब्रांड के जूते-चप्पल ही पहनें।

 

 

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