बारूदी सुरंगों के कहर से निजात पाने में लगी है दुनिया, मृतकों की संख्या में आई कमी

श्रीगंगानगर, 1 दिसम्बर (का.सं.)। पूरी दुनिया में बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल में लगातार कमी आ रही है। दुनिया में 160 से अधिक देश अब बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल नहीं करते। पूरी दुनिया में बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल न करने को लेकर जागरूकता बढी है, जिससे मृतकों की संख्या में काफी कमी आई है। बावजूद इसके अभी भी भारत सहित पांच देशों ने बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल न किए जाने संबंधी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। यह जानकारी आज श्रीगंगानगर में इंडियन इंस्टिट्यूट फॉर पीस डिजास्टरमेंट एंड एनवायरमेंटल प्रोटक्शन के अध्यक्ष डॉ बालाकृष्ण कुर्वे ने बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल में आई कमी के दृष्टिगत आयोजित एक कार्यशाला में दी। इंटरनेशनल कंप्लेन टू बैन लैंडमाइंस(आईसीबीएल) में भारत का बतौर समन्वयक प्रतिनिधित्व कर रहे डॉ. कुर्वे ने बताया कि अभी तक दुनिया के 164 देशों ने ओटाया संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। इन देशों में अब न तो बारूदी सुरंगों का उत्पादन होता है और ना ही इस्तेमाल किया जाता है। डॉ. कुर्वे के अनुसार भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ संबंध अच्छे नहीं होने के कारण अभी तक भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं लेकिन देश के कुछ हिस्सों में बारूदी सुरंगों का उपयोग करना बंद कर दिया है। उन्होंने बताया कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अब बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल नहीं होता। यहां तक की उत्तर-पूर्व राज्यों में सक्रिय मिलिटेंट ग्रुपों ने भी बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल करना रोक दिया है लगातार तीन-चार साल प्रयास करने पर मिल्टन ग्रुपों ने संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। जम्मू कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के साथ लगती अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर मजबूरीवश बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल अभी रूका नहीं है, लेकिन राहत की बात यह है कि अब परंपरागत बारूदी सुरंगों की वजह स्मार्ट बारूदी सुरंगे जरूरत पडऩे पर लगाई जाती हैं। स्मार्ट बारूदी सुरंगों की खासियत यह है कि एक तय अवधि के बाद यह अपने आप निष्क्रिय हो जाती हैं। इससे कोई नुकसान नहीं होता। उन्होंने बताया कि भारत के अलावा पाकिस्तान, अमेरिका रूस और चीन ने संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। पिछले करीब अढाई दशक से दुनिया भर में बारूदी सुरंगों के कहर के खिलाफ चल रहे अभियान का सार्थक परिणाम यह सामने आया है कि जहां पहले वर्ष में औसतन तीस हजार व्यक्ति बारूदी सुरंगों की वजह से जाने गंवाते थे या प्रभावित होते थे, अब यह आंकड़ा घटकर औसतन पांच हजार वार्षिक रह गया है। इसके खिलाफ अभियान अभी भी जारी है वह दिन जल्दी ही आएगा जब पूरी दुनिया में बारूदी सुरंगों का उत्पादन बंद हो जाएगा और इसका इस्तेमाल भी नहीं होगा। डॉ. कुर्वे ने बताया कि आईसीबीएल को इसी के लिए वर्ष 1997 में नोबेल का विश्व शांति पुरस्कार मिला। बारूदी सुरंगों से प्रभावितों की संख्या में काफी कमी आने के कारण ही संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) ने सिविल सोसाइटी के तौर पर सदस्यता दी है। सिविल सोसाइटी को यूएनओ में स्थान मिलने से दुनिया भर में बारूदी सुरंगों को लेकर हो रही गतिविधियों तथा इसके प्रभावों को तथ्यों के साथ रखने का एक महत्वपूर्ण मौका मिला है। यू एनओ के तत्वाधान में ही अब दुनिया भर में उन क्षेत्रों में जाकर लोगों का आभार व्यक्त किया जा रहा है, जिन्होंने बारूदी सुरंगों के विरुद्ध अभियान में अहम योगदान प्रदान किया। श्रीगंगानगर जिला पाकिस्तान सीमा पर अवस्थित होने के कारण यहां के सीमा क्षेत्र में भी वर्ष 2002 में संसद पर आतंकी हमले के पश्चात पड़ोसी देश के साथ संबंध तनावपूर्ण हो जाने पर ऑपरेशन पराक्रम के तहत बारूदी सुरंगे बिछाई गई थीं। बारूदी सुरंगों से जानमाल के हुए नुकसान के दृष्टिगत इस इलाके में अभियान चलाने वाले शिक्षक ओम सुथार ने बताया कि तब जिले में करीब 10 व्यक्तियों ने जान गंवाई और 167 व्यक्ति प्रभावित हुए। असंख्य पशु मारे गए। लोगों का जनजीवन काफी प्रभावित हुआ। लोगों के जख्म आज भी हरे हैं। प्रभावित हुए लोगों को सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा। सरकार ने इनको मुआवजा तो दिया लेकिन और किसी प्रकार की राहत प्रदान नहीं की।सेमिनार में पंजाब के समीपवर्ती अबोहर व फाजिल्का क्षेत्र में बारूदी सुरंगों के खिलाफ अलख जगाने में अहम सहयोग करने वाले भूपेंद्र सिंह ने भी विचार रखे। श्रीगंगानगर जिले मेंं बारूदी सुरंगों से प्रभावित का सर्वे करने वाले शिक्षाविद महावीर सरावगी ने अध्यक्षता की। विशिष्ट अतिथि यातायात पुलिस प्रभारी कुलदीप चारण और श्रीमती पुष्पिता लहरी ने भी संबोधित किया। कार्यशाला में बारूदी सुरंग प्रभावित व्यक्ति और उनके परिवारों केे सदस्य शामिल हुए। मंच संचालन डॉक्टर एस एम लहरी ने किया।

 

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