Yuvraj ने अंतरराष्ट्रीय क्र्रिकेट से लिया संन्यास

कहा- 2011 वल्र्ड कप जीतना जिंदगी का सबसे बड़ा लम्हा
सचिन से संन्यास के मुद्दे पर बात हुई, उन्होंने कहा था यह फैसला खुद लेना, लोगों के कहने पर नहीं : युवराज

2011 वल्र्ड कप में युवराज ने 90.50 के औसत से 362 रन बनाए और 15 विकेट लिए थे
मुंबई, 10 जून (एजेंसी)। भारत को 2011 का वर्ल्ड कप जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले युवराज सिंह ने सोमवार को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया। युवराज ने 2011 के वर्ल्ड कप में 9 मैच में 90.50 के औसत से 362 रन और 15 विकेट लिए थे। वे उस वर्ल्ड कप में प्लेयर ऑफ द सीरीज भी चुने गए थे।
2011 वर्ल्ड कप के दौरान युवराज कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। हालांकि, उन्होंने किसी को इस बात का पता नहीं चलने दिया। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ क्वार्टर फाइनल से पहले डॉक्टरों ने उनको नहीं खेलने की सलाह दी थी, लेकिन वे न सिर्फ मैदान में उतरे, बल्कि भारत की जीत के हीरो भी रहे। उन्होंने उस मैच में 57 रन की पारी खेली थी।

 

कैंसर को मात देने
वाले युवराज सिंह
के करियर की ये हैं सर्वश्रेष्ठ पारियां

जनवरी 2000 : युवराज सिंह ने 2000 में श्रीलंका में अंडर 19 विश्व कप में भारत के लिए शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 33 . 83 की औसत से 203 रन बनाए और बायें हाथ की स्पिन गेंदबाजी से भी प्रभावित किया।
अक्टूबर 2000 : युवराज ने नैरोबी में कीनिया के खिलाफ एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच के साथ भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया।
अक्टूबर 2000 : अपना दूसरा एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच और पहली अंतरराष्ट्रीय पारी खेल रहे युवराज ने आईसीसी नाकआउट टूर्नामेंट में आस्ट्रेलिया के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में 80 गेंद में 84 रन बनाकर भारत को यादगार जीत दिलाई।
जुलाई 2002 : युवराज ने 69 रन की पारी खेली और मोहम्मद कैफ के साथ मिलकर भारत को इंग्लैंड के खिलाफ लार्ड्स में नेटवेस्ट सीरीज के फाइनल में 325 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए दो विकेट की रोमांचक जीत दिलाई।
जनवरी 2004 : युवराज ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 122 गेंद में 139 रन की पारी खेली जो उस समय उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ पारी थी।
फरवरी 2006 : युवराज सिंह एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में भारत के सबसे उपयोगी और निरंतर प्रदर्शन करने वाले क्रिकेटर के रूप में उभरे। पाकिस्तान के खिलाफ श्रृंखला में 4-1 की जीत के दौरान उन्होंने नाबाद 87 और 79 रन की पारी खेली जिससे टीम ने श्रृंखला जीती। उन्होंने इस श्रृंखला में 93 गेंद में नाबाद 107 रन भी बनाए जिससे भारत 287 रन के लक्ष्य का पीछा करने में सफल रहा।
सितंबर 2007 : पहले विश्व टी20 में युवराज ने स्टुअर्ट ब्राड के एक ओवर में छह छक्के जड़कर रिकार्ड बुक में नाम दर्ज कराया। उन्होंने सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया के खिलाफ भी 70 रन की मैच विजेता पारी खेली जिसके बाद भारत ने एतिहासिक खिताब जीता। सबसे लंबा 119 मीटर का छक्का जडऩे का रिकार्ड भी उनके नाम दर्ज है।
दिसंबर 2007 : युवराज को भारत की टेस्ट टीम में जगह बनाने के लिए हमेशा जूझना पड़ा लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलोर में 169 रन की पारी खेली जिससे भारत ने घरेलू सरजमीं पर टेस्ट श्रृंखला जीती।
19 फरवरी से दो अप्रैल 2011: यह युवराज सिंह और भारतीय टीम के लिए स्वप्निल विश्व कप रहा। भारत ने 28 साल बाद दोबारा विश्व कप जीता। युवराज ने नौ मैचों में 90.50 की औसत से 362 रन बनाए जिसमें एक शतक और चार अर्धशतक शामिल रहे। उन्होंने चार मैच आफ द मैच पुरस्कार के अलावा टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुना गया। युवराज सिंह किसी एक विश्व कप में 300 से अधिक रन बनाने वाले और 15 विकेट हासिल करने वाले पहले आलराउंडर बने। विश्व कप के तुरंत बाद उन्हें फेफड़ों में कैंसर का पता चला लेकिन वह इससे उबरने में सफल रहे और अगले साल के अंत तक क्रिकेट के मैदान पर वापसी की।

युवराज के संन्यास पर बोले तेंदुलकर, आपने क्रिकेट के लिए जो किया उसके लिए शुक्रिया

क्रिकेट के मैदान से लेकर कैंसर से जंग जीतने और फिर खेल के मैदान पर वापसी करने के दौरान युवराज सिंह के प्रेरणा के स्रोत रहे सचिन तेंदुलकर ने उनके संन्यास पर खेल को दिये योगदान के लिए शुक्रिया किया। अपने 17 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर के दौरान ज्यादातर समय तक तेंदुलकर के साथ ड्रेसिंग रूम को साझा करने वाले युवराज ने सोमवार को यहां अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास की घोषणा की। संन्यास के बाद खेल जगत ने उनके योगदान की सराहना की जिसमें तेंदुलकर भी शामिल है। उन्होंने ट्वीट किया कि युवराज आपका करियर बहुत ही शानदार रहा। जब भी टीम को जरूरत हुई आप चैम्पियन की तरह खेले। मैदान के अंदर और बाहर आपने जो जीवटता दिखायी वह कमाल की थी।  आपको दूसरी पारी के लिए शुभकामनाएं और आप ने क्रिकेट के लिए जो भी किया उसके लिए शुक्रिया। तेंदुलकर और युवराज की दोस्ती किसी से छुपी नहीं है। भारत 2011 में जब विश्व चैम्पियन बना था तब युवराज ने उन्हें कंधे पर बैठाकर मैदान का चक्कर काटा था। इसके बाद जब युवराज के कैंसर से पीडि़त होने का पता चला तब तेंदुलकर उनसे मिलने लंदन गये और अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके।

 

युवराज के नाम 17 अंतरराष्ट्रीय शतक

युवराज ने 40 टेस्ट की 62 पारियों में 33.92 के औसत से 1900 रन बनाए हैं। इसमें 3 शतक और 11 अर्धशतक भी हैं। उन्होंने 304 वनडे की 278 पारियों में 36.55 के औसत से 8701 रन बनाए। उन्होंने वनडे इंटरनेशनल में 14 शतक और 52 अर्धशतक लगाए हैं। युवराज ने 58 टी-20 इंटरनेशनल भी खेले। इसमें 28.02 के औसत से 1177 रन बनाए। उन्होंने टेस्ट में 9, वनडे में 111 और टी-20 इंटरनेशनल में 28 विकेट भी लिए हैं।
वल्र्ड कप जीतना मेरे लिए सपने की तरह था : युवराज
संन्यास का ऐलान करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं बचपन से ही अपने पिता के नक्शेकदम पर चला और देश के लिए खेलने के उनके सपने का पीछा किया। मेरे फैन्स जिन्होंने हमेशा मेरा समर्थन किया, मैं उनका शुक्रिया अदा नहीं कर सकता। मेरे लिए 2011 वर्ल्ड कप जीतना, मैन ऑफ द सीरीज मिलना सपने की तरह था। इसके बाद मुझे कैंसर हो गया। यह आसमान से जमीन पर आने जैसा था। उस वक्त मेरा परिवार, मेरे फैन्स मेरे साथ थे।
कभी सोचा नहीं था कि देश के लिए खेलूंगा
उन्होंने कहा, ‘एक क्रिकेटर के तौर पर सफर शुरू करते वक्त मैंने कभी नहीं सोचा था कि कभी भारत के लिए खेलूंगा। लाहौर में 2004 में मैने पहला शतक लगाया था। टी-20 वर्ल्ड कप में 6 गेंदों में 6 छक्के लगाना भी यादगार था। 2014 में टी-20 फाइनल मेरे जीवन का सबसे खराब मैच था। तब मैंने सोच लिया था कि मेरा क्रिकेट करियर खत्म हो गया है। तब मैं थोड़ा रुका और सोचा कि क्रिकेट खेलना शुरू क्यों किया था।
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ छक्का लगाकर वापसी की
‘डेढ़ साल बाद मैंने टी-20 में वापसी की। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आखिरी ओवर में छक्का लगाया। 3 साल बाद मैंने वनडे में वापसी की। 2017 में कटक में मैंने 150 रन बनाए, जो मेरे करियर का सबसे बड़ा वनडे स्कोर है। मैंने हमेशा खुद पर भरोसा रखा। कोई मायने नहीं रखता कि दुनिया क्या कहती है।
सफलता और मौके दोनों नहीं मिल रहे थे
‘मैंने सौरव की कप्तानी में करियर शुरू किया था। सचिन, राहुल, अनिल और श्रीनाथ जैसे लीजेंड के साथ खेला। जहीर, वीरू, गौतम, भज्जी जैसे मैच विनर्स के साथ खेला। संन्यास के फैसले पर युवराज ने कहा, ‘सफलता भी नहीं मिल रही थी और मौके भी नहीं मिल रहे थे। 2000 में करियर शुरू हुआ था और 19 साल हो गए थे। उलझन थी कि करियर कैसे खत्म करना है। सोचा कि पिछला टी-20 जो जीते हैं, उसके साथ खत्म करता तो अच्छा होता, लेकिन सबकुछ सोचा हुआ नहीं होता। जीवन में एक वक्त आता है कि वह तय कर लेता है कि अब किधर जाना है।
10 हजार रन बनाने के बारे में कभी नहीं सोचा था
उन्होंने कहा, ‘मेरे करियर का सबसे बड़ा लम्हा 2011 वर्ल्ड कप जीतना था। जब मैंने पहले मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 84 रन बनाए थे, तब वह करियर का बड़ा मोड़ था। इसके बाद कई मैच में फेल हुआ, लेकिन बार-बार मौके मिले। मैंने कभी 10 हजार रन बनाने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन वर्ल्ड कप जीतना खास था। मैन ऑफ द सीरीज रहना, 10 हजार रन बनाना, इससे ज्यादा खास था वर्ल्ड कप जीतना। यह केवल मेरा नहीं, बल्कि पूरी टीम का सपना था।’
संन्यास को लेकर मां और पत्नी से भी बात की
‘मैं 2 साल से संन्यास पर मां और पत्नी से बात कर रहा था। पिता ने कहा कि जब कपिल देव को वर्ल्ड कप के लिए नहीं चुना गया होगा, तो उन्होंने क्या सोचा होगा, लेकिन जब तुमने वर्ल्ड कप जीता था, तब वे कितने खुश हुए होंगे। मेरे पिता को मेरे संन्यास लेने के फैसले पर कोई परेशानी नहीं हुई।

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