ब्लास्ट से मेरे घर का फ्लोर उखड़ गया था, लेकिन मैं खुश था कुणाल खेमू

कुनाल खेमू बताते हैं कि जब कश्मीरी पंडितों का नरसिंहार शुरू हुआ था तब वह बच्चे थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या अच्छा हो रहा है और क्या बुरा।जनवरी का महीना पूरी दुनिया के लिए एक नई उम्मीद लेकर आता है, लेकिन कश्मीरी पंडितों के लिया साल का यह पहला महीना दु:ख, दर्द और निराशा से भरा होता है। शायद वह आज भी 19 जनवरी 1990 के उस नरसंहार और त्रासदी को भूल नहीं पाए हैं। जिहादी इस्लामिक ताकतों ने कश्मीरी पंडितों पर ऐसा कहर ढाया कि उनके लिए सिर्फ तीन विकल्प रह गए थे, धर्म बदलो, मरो या फिर पलायन करो।
जब कश्मीर खून से लाल हो रहा था, तब कई मासूम चेहरे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। वह टीवी की खबरों में अपना घर देखते तो खुश हो जाते। भयानक ब्लास्ट के बाद, जब दूर रहने वाले शुभ चिंतकों के फोन आते तो बच्चों के चेहरों में खुशी छा जाती थी। इस त्रासदी को एक मासूम चेहरा देख रहा था, जो आज बॉलिवुड का जाना-पहचाना चेहरा है। हम बात कर रहे हैं कुणाल खेमू की। अपनी फिल्म मलंग के प्रमोशनल इंटरव्यू के दौरान  हुई बातचीत में कश्मीर की यादों को ताजा करते हुए कुणाल बताते हैं, मैं इस बात को लेकर बिल्कुल भी खुश नहीं हूं कि कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की बात सामने आ रही है, जिनको इस बारे में जानना था, उनको पहले से ही अच्छी तरह पता है। मैं इस बात को लेकर जरूर खुश हूं कि विधु विनोद चोपड़ा जैसे प्रड्यूसर और डायरेक्टर ने इस विषय पर फिल्म बनाई, उनके रूट्स भी वहीं से हैं, इसलिए वे विषय को बहुत अच्छी तरह समझते हैं।
ब्लास्ट का असर इतना ज्यादा था कि मेरे घर के परखच्चे उड़ गए थे -कश्मीरी पंडितों के साथ जब नरसंहार हो रहा था, तब मैं बहुत छोटा था, जहां तक मुझे याद है यह 1989 का साल था, उन दिनों घाटी में तनाव बहुत ज्यादा था। हम लोग श्रीनगर में रहते थे। मैं इतना ज्यादा छोटा था कि मुझे यह नहीं समझ आ रहा था कि असल में क्या बुरा हो रहा है। मुझे एक ब्लास्ट याद आता है, जो मेरे घर के पास हुआ था, उस ब्लास्ट का असर इतना ज्यादा था कि मेरे घर के परखच्चे उड़ गए थे, मैं खुद हिल गया था, घर का फ्लोरिंग उखड़ गया था।
उस शाम मैं बहुत खुश था, क्योंकि सबके फोन आ रहे थे
मैं और मेरा भाई बाहर खेल रहे थे। उस शाम मैं बहुत खुश था, क्योंकि सबके फोन आ रहे थे, मुझे लग रहा था कि पूरे परिवार और करीबियों के लिए हम कितने महत्वपूर्ण हैं, खुशी की दूसरी बात थी कि उसी शाम न्यूज़ में हमारा घर टीवी पर दिखाया जा रहा था। मैं खुद का घर टीवी पर देख कर सोच रहा था, हम तो न्यूज़ में आ गए और फेमस हो गए हैं।
घाटी छूटने की ज्यादा तकलीफ मेरे दादा-दादी को थी -‘कहीं न कहीं मैं इस बात और विषय से बाद में दूर होता गया, क्योंकि उसी दौरान हमने श्रीनगर छोड़ दिया था। घाटी छूटने की ज्यादा तकलीफ मेरे माता-पिता और दादा-दादी को थी, क्योंकि वह अपनी जमीन से दूर हो रहे थे। बचपन से ही मैं कश्मीर नरसंहार की घटना से दूर था, क्योंकि जब भी घर में या अन्य लोगों के बीच घाटी की बात होती, लोगों के चेहरों में दु:ख और खलिश की पीड़ा दिखाई देती थी। मैं यह सोचकर कभी भी कश्मीर और श्रीनगर की किसी बातचीत को नहीं छेड़ता था, क्योंकि मुझे लगता था कि यह विषय लोगों को दु:ख पहुंचाता है।
कलंक की शूटिंग के दौरान 25 साल बाद मैं उस जमीन पर उतरा था -उस समय बच्चा था मैं, मेरी मानसिकता अलग थी, समझ आधी-अधूरी थी। जब घाटी के हालात अच्छे हुए तो बीते सालों में मेरे माता-पिता और भाई-बहन कई बार श्रीनगर गए, लेकिन मैं कभी नहीं गया। कलंक की शूटिंग के दौरान जब हम कारगिल जा रहे थे तो लगभग 25 साल बाद मैं उस जमीन पर उतरा था, मैं उस दिन बहुत खुश था, क्योंकि जितने भी कश्मीरी मिल रहे थे, उनसे कश्मीरी में बात कर पा रहा था, हमारे घर में ज्यादातर बातचीत कश्मीरी भाषा में होती है।
कश्मीर नरसंहार हिन्दू-मुस्लिम नहीं आतंकवाद का मुद्दा है –मुझे बहुत ज्यादा नहीं पता कि कश्मीर नरसंहार की घटना हिन्दू-मुस्लिम वाला मुद्दा था, मेरे हिसाब से शायद यह आतंकवाद का मुद्दा था। वैसे यह मामला बहुत ही पॉलिटिकल विषय है। अगर विधु विनोद चोपड़ा ने पर फिल्म बनाई है तो उन्हें अच्छी तरह पूरा मामला पता होगा। मोहित सूरी के निर्देशन में तैयार फिल्म मलंग में कुणाल खेमू के अलावा दिशा पाटनी, आदित्य राय कपूर, अनिल कपूर और अमृता खानविलकर अहम भूमिका में हैं। कुनाल खेमू बताते हैं कि जब कश्मीरी पंडितों का नरसिंहार शुरू हुआ था तब वह बच्चे थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या अच्छा हो रहा है और क्या बुरा।जनवरी का महीना पूरी दुनिया के लिए एक नई उम्मीद लेकर आता है, लेकिन कश्मीरी पंडितों के लिया साल का यह पहला महीना दु:ख, दर्द और निराशा से भरा होता है। शायद वह आज भी 19 जनवरी 1990 के उस नरसंहार और त्रासदी को भूल नहीं पाए हैं।

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