इनसाइडर हो या आउटसाइडर, टैलंट की कद्र होनी चाहिए नवाजुद्दीन सिद्दीकी

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने कहा, ‘मेरा मानना है कि टैलंट की कद्र होनी चाहिए, चाहे वो आउटसाइडर हो या इनसाइडर हो। मैं अपनी बात करूं, तो मैं यहां काम करने आया हूं। ये मेरी कर्मभूमि है। न मैं आउटसाइडर हूं, न मैं इनसाइडर हूं। मेरे लिए ये वर्किंग प्लेस है।बॉलिवुड के टैलंटेड ऐक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी इन दिनों मुंबई से दूर अपने गांव बुधाना में प्रकृति और परिवारवालों के साथ वक्त बिता रहे हैं। हालांकि, इन दिनों एक ओर वे नेटफ्लिक्स पर आई अपनी फिल्म ‘रात अकेली है’ से चर्चा में हैं, वहीं उनकी पर्सनल लाइफ की उथल-पुथल भी सुर्खियों में है। ऐसे में, एक ऑनलाइन मुलाकात के दौरान हमने उनसे इन सभी विषयों पर खास बातचीत की:
आप इन दिनों मुंबई के शोर-शराबों से दूर गांव में वक्त बिता रहे हैं। कैसी है वहां की जिंदगी?
यहां पर कुछ नहीं पता चल रहा कि वहां पर क्या हो रहा है। सब अपनी दुनिया में मस्त हैं। सुबह 5 बजे उठकर खेतों पर चले जाते हैं, शाम को सात-आठ बजे सो जाते हैं। अच्छी बात ये है कि यहां कोई इंफेक्शन नहीं हैं। फिर भी खेतों में भी सोशल डिस्टेसिंग हो रही है। (हंसते हैं)
फिर भी, सोशल मीडिया पर इन दिनों जो इनसाइडर-आउटसाइर की बहस चल रही है, उससे तो आप रूबरू होंगे। इस पर आपकी क्या राय है?
मैं आर्टिस्ट हूं। मैंने कहीं पढ़ा था कि बोलो मत, दुनिया को करके दिखाओ। ये शिकायत करना..पता नहीं। देखिए, यहां बाहर से हजारों-लाखों आर्टिस्ट आते हैं, कई यहां अपनी जगह भी बनाते हैं। मेरा मानना है कि टैलंट की कद्र होनी चाहिए, चाहे वो आउटसाइडर हो या इनसाइडर हो। मैं अपनी बात करूं, तो मैं यहां काम करने आया हूं। ये मेरी कर्मभूमि है। न मैं आउटसाइडर हूं, न मैं इनसाइडर हूं। मेरे लिए ये वर्किंग प्लेस है। मैं यहां कोई टारगेट लेकर नहीं आया था कि मुझे पांच साल में काम मिल जाएगा। मैं यहां इसलिए आया था कि मुझे यहीं काम करना है। मुझे छोटा रोल मिलता, बड़ा मिलता, मुझे इसी में काम करना है। मुझे नहीं पता था कि सक्सेस पचास साल में मिलेगी या साठ साल में। मैं उसके लिए आया ही नहीं था। आर्टिस्ट कैलकुलेटिव नहीं होता। पिकासो अपनी पेंटिंग इसलिए नहीं बनाता रहा कि एक दिन मैं सक्सेसफुल होऊंगा, बल्कि उसका पैशन है पेंटिंग बनाना। ये कैलकुलेशन हो जाती है, जब आप ये सोचें कि एक दिन मुझे सक्सेस मिलेगी, एक दिन मैं वे हो जाऊंगा, वो बन जाऊंगा। जब आप ये सोचते हैं कि मैं एक दिन स्टार बनूंगा, तब आप आर्टिस्ट नहीं रह जाते।
फिल्म रात अकेली है में एक लड़की आपकी रंगत को लेकर जज करती है कि रंग साफ नहीं है, इसलिए शादी योग्य नहीं है। क्या इंडस्ट्री में आपको कभी ऐसी चीजों का सामना करना पड़ा?
हमारे गांव में पहले ये था कि बेटा, लड़की तो गोरी लेकर आना। अब सांवली लड़की कहां जाएगी? तब मेरे अंदर भी रंग को लेकर बहुत कॉम्पलैक्सिटी थी। अब तो खैर नहीं है, लेकिन जैसे फिल्म में सीन है कि मैं गोरेपन की क्रीम छिपाकर लगाता हूं। ये मेरे साथ खुद हुआ था कि मैं नकली क्रीम खरीद लाया और लड़की से वह क्रीम लगाकर मिलने गया। लड़की ने पूछा कि क्रीम लगाकर आए हो? तो मैंने कहा- नहीं। वह बोली- चेहरे पर सफेद दिख रहा है। दरअसल, वह क्रीम नकली थी, इसलिए चेहरे पर चिपक गई थी। फिल्म में मेरे किरदार जटिल की भी ऐसी कॉम्पलैक्सिटी है। रही बात इंडस्ट्री की, तो यहां भी ऐसा होता है, लेकिन एक समय के बाद ये सब चीजें बहुत पीछे हो जाती हैं। इससे फायदा भी होता है कि आप अपनी शक्ल-सूरत से ज्यादा काम पर फोकस करने लगते हैं। वरना कोई ज्यादा तारीफ कर देता कि तू बहुत खूबसूरत है, तो शायद मैं उसी में उलझा रहता।
फिल्म में जिस परिवार के सदस्य के साथ गलत होता है, उसके अपने ही आरोपों के घेरे में हैं। इधर, आप पर भी आपके अपने (पत्नी) ने ही गंभीर आरोप लगाए हैं। कुछ कहना चाहेंगे?
मैं अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में चर्चा नहीं करना चाहता। अभी फिल्म की बात करते हैं। इसके बारे में फिर कभी बात करेंगे।
इस लॉकडाउन में ओटीटी पर बहुत सारा कॉन्टेंट आ रहा है। तीसरे पर्दे की इस ग्रोथ को किस तरह देखते हैं?
ओटीटी ने लॉकडाउन में सिनेप्रेमियों को बहुत एजुकेट किया है। युवा पीढ़ी ने ओटीटी पर दुनिया भर का सिनेमा और सीरीज देखी, तो उन्हें पता चला कि असल में सिनेमा क्या होता है या ऐक्टिंग क्या होती है। हम लोगों के लिए ये बहुत अच्छा हुआ है कि आज की युवा पीढ़ी की सिनेमा को लेकर समझ विकसित हुई है, तो अगर हम उनके हिसाब से नहीं चलेंगे और बहुत पुरानी लकीरें पीटते रहते हैं, तो काम नहीं चलेगा। दूसरी अच्छी बात ये हुई है कि ओटीटी के चलते बहुत सारे बेहतरीन ऐक्टर निकलकर आए हैं। ऐसे बहुत सारे ऐक्टर्स, जो बेचारे दिल्ली में पड़े हुए थे, छोटा-मोटा थिएटर कर रहे थे, उन कमाल के टैलंटेड ऐक्टर्स को ओटीटी ने बड़ा प्लैटफॉर्म दिया है।

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