सोशल मीडिया को अलविदा कहने वाला हूं जॉन अब्राहम

John abraham  Gonna say goodbye to social media

 

इस समय जॉन अब्राहम की आने वाली फिल्म बाटला हाउस काफी चर्चा में है। इससे पहले जॉन ने राजीव गांधी की हत्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर मद्रास कैफे जैसी फिल्म भी बनाई थी। अब इस फिल्म पर एक बार फिर विवाद हो रहा है और जॉन से इस मुद्दे पर खुलकर की बात।पिछले साल लखनऊ में शूट हुई जॉन अब्राहम स्टारर बाटला हाउस इस बार देश की सर्वाधिक विवादास्पद फिल्म बन गई है। इस मुलाकात में जॉन फिल्म, विवाद, आर्टिकल 370, सोशल मीडिया और नाकामी के बारे में खुलकर बात करते हैं
सुना है कि बाटला हाउस के आरोपियों ने फिल्म पर रोक लगाने की याचिका दायर की है?
हां, मामला अभी अदालत में है, तो हम इस विषय में कुछ कह नहीं सकते, मगर हमने शुरू में ही डिस्क्लेमर दिया है कि यह फिक्शन पर आधारित है। हमने सिर्फ इतना कहा है कि यह रियल इवेंट से प्रेरित है, न कि उस पर आधारित है। इसे सीबीएफसी ने इसे यूए सर्टिफिकेट के साथ पास भी किया है।
आपने हाल ही में उपराष्ट्रपति के लिए बाटला हाउस की स्पेशल स्क्रीनिंग रखी? कैसा था अनुभव?
वेंकैया नायडू साहब बहुत ही विद्वान शख्स हैं। उन्होंने इस बात की सराहना की कि हम फिल्म को अलग-अलग नजरिए से दिखाने में कामयाब रहे। उनका कहना था कि उन्हें खुशी है कि हमने महज एक पुलिस हीरो वाली कहानी नहीं दिखाई। उन्हें बहुत अच्छा लगा और वह काफी प्रभावित भी हो गए।
आपने अपनी फिल्मों में पुलिस को एक अच्छी इमेज में पेश किया है, मगर आम तौर पर पुलिस की इमेज बहुत खराब है, पुलिस पर लोग ट्रस्ट नहीं कर पाते?
असल में खबरों के जरिए, फिल्मों के जरिए हमने पुलिस को काफी नकारात्मक रूप से प्रॉजेक्ट किया है, तो अब समय आ गया है कि हम दर्शकों को बताएं कि हमारे पुलिस विभाग में ईमानदार पुलिस अफसर भी हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो देश के लिए काम करते हैं। मुझे अपनी फिल्मों में यही दर्शाना था। इसलिए मैंने अपनी फिल्म के लिए बाटला हाउस जैसा विषय चुना। मीडिया, सोशल मीडिया और फिल्मों के जरिए आप रोजाना पढ़ते हैं कि फलां पुलिस ने रिश्वत ली, फलां ने किसी को मारा-पीटा। ऐसा नहीं है कि पुलिस विभाग में करप्शन नहीं है? है, मगर ऑनेस्ट पुलिसवाले भी हैं। अपनी फिल्मों के जरिए मैं यही कोशिश करता हूं कि देश के सिपाहियों को मैं उनके अच्छे कामों के साथ प्रस्तुत कर सकूं।
सोशल मीडिया पर स्टार्स को निशाना बनाए जाने के बारे में क्या कहेंगे?
सोशल मीडिया पर आज हर कोई ऐक्टिव है और वह हर विषय पर बोल रहा है, मगर दस में से नौ लोग यह जानते ही नहीं कि वो उस विषय पर क्यों बोल रहा है? वे अनपढ़ हैं, उनमें जागरूकता का अभाव है। सोशल मीडिया पर अच्छे लोग भी हैं, मगर बे-सिर पैर की बकवास करने वाले ज्यादा हैं। आप अगर सोशल मीडिया पर आधे घंटे के लिए भी चले जाओ, तो बीमार पड़ जाओगे। वे धर्म, जाति, समुदाय को लेकर बुरी-बुरी बात करेंगे। कोई भी पॉजिटिव बात नहीं होगी। उसी तरह न्यूज चैनल भी तो इन्सिक्यॉरिटी फैलाने का काम करते हैं। मैंने हाल ही में पांच मिनट में 25 खबरें देखने का फैसला किया और यकीन जानिए कि उन 25 खबरों में 24 खबरें मौत, बलात्कार, बाढ़, दंगे आदि की थीं। कोई भी अच्छी खबर नहीं थी। सोशल मीडिया मेड मी सिक (सोशल मीडिया मुझे बीमार बनाता है)
मगर कलाकार होने के नाते आपको सोशल मीडिया पर बने रहना पड़ता है?
हां, बने तो रहना पड़ता है, मगर मैंने तय किया है कि धीरे-धीरे मैं खुद को सोशल मीडिया से डिटैच कर दूंगा। एक-डेढ़ साल पहले मैंने प्रेडिक्ट भी किया था कि अभी एक दौर ऐसा आएगा, जब सिलेब्रिटीज सोशल मीडिया को अलविदा कह देंगे। मैं सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा ऐक्टिव नहीं हूं। हां, मुझे आर्टिकल 370 और 35ए के अपडेट्स चाहिए, तो मैं इस पर बना हुआ हूं, मगर बहुत जल्द मैं यहां से गायब होनेवाला हूं।
अगर आपकी फिल्म बाटला हाउस की बात करूं, तो इस विवादास्पद विषय पर फिल्म बनाने का विचार क्यों किया?
सच कहूं तो अभिनेता के रूप में मुझे इसकी स्क्रिप्ट बहुत जानदार लगी। फिर मुझे लगता है कि उत्तर भारत में अगर बाबरी मस्जिद के बाद सबसे ज्यादा चर्चा का विषय कोई और रहा, तो वह था बाटला हाउस। इस एनकाउंटर के बाद सभी फॉल्ट लाइंस ब्रेक हो गई थीं। बाटला हाउस ने धर्म, राजनीति, समुदाय सभी को विभाजित कर दिया था। मुझे इस बात की उत्सुकता थी कि हम जो कहानी कह रहे हैं, वह किसी के पक्ष में या विपक्ष में? मैंने निखिल (निर्देशक निखिल अडवानी) से यही कहा कि जो भी हम बोलेंगे, उसमें सारे पॉइंट ऑफ व्यू रखेंगे। दर्शक जब थिअटर से फिल्म देखकर निकलेगा, तो उसे तय करना होगा कि किसका पॉइंट ऑफ व्यू सही है।
आपने मद्रास कैफे जैसे मुद्दे वाले विषय पर फिल्म बनाई है? आप कश्मीर में आर्टिकल 370 को हटाए जाने के बारे में क्या कहेंगे?
मुझे इसे समझने में एक-दो दिन लगेंगे। वैसे मुझे पूरे विषय और मुद्दे की जानकारी है। हरी सिंह, शेख अब्दुल्ला और नेहरू के बीच क्या हुआ? जैसे तमाम प्रकरण से वाकिफ हूं। कोई अगर मुझसे पूछे कि क्या आर्टिकल 370 को हटाए जाना सही है? तो जवाब इतना आसान नहीं है। क्या मुद्दा फिक्स हो सकता है? इसका उत्तर भी सरलता से नहीं मिलेगा। इसके लिए हमें इतिहास की पड़ताल करनी होगी। मैं अपने कलीग्स से भी कहता हूं कि अगर आपको पता नहीं, तो इन मुद्दों पर कॉमेंट न करें। ये बहुत ही संवेदनशील मुद्दे हैं। हाल ही में मैं न्यूज चैनल टाइम्स नाउ पर गया था और वहां भी मुझसे यही पूछा गया कि क्या आर्टिकल 370 को निरस्त किया जाना चाहिए था? मैंने उनसे यही कहा कि आप चाहते हैं कि मैं इस पर कॉमेंट करूं, मगर मैं नहीं करूंगा, इसलिए नहीं कि मैं पॉलिटिकली करेक्ट रहना चाहता हूं, मुझे लगता है कि आपको इस मुद्दे की पूरी जानकारी नहीं है और यदि आप मुझसे पूछते हैं, तो मुझे भी मौका दो कि मैं आपको पूछ सकूं। तो उन्होंने माना कि वे इस मुद्दे के विशेषज्ञ नहीं हैं। यह बहुत ही जटिल मुद्दा है। मेरा अपना नजरिया है, मगर फिलहाल मैं उसे जाहिर नहीं करना चाहता।

 

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