चिंताजनक: लॉकडाउन से डिप्रेशन के शिकार मरीजों की संख्या बढ़ी

इनसान का मूड पल-पल बदलता रहता है। ऐसे में नकारात्मक विचारों को मन से बाहर निकालने और ‘फील गुड करने के लिए विशेषज्ञ अक्सर घूमने-फिरने, प्रकृति के साथ समय गुजारने व दिल को भाने वाले काम करने की सलाह देते हैं। हालांकि, कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए लागू लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के पालन के दबाव के चलते ये सारी गतिविधियां मुमकिन नहीं हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने इसी के मद्देनजर डिप्रेशन के शिकार मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा होने की आशंका जताई है। ‘जामा साइकियाटरी में छपे शोधपत्र में उन्होंने मूड नियंत्रित करने की सामान्य प्रक्रिया को बहाल करने के उपाय तलाशने की नसीहत दी है। अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने अमीर-गरीब और विकासशील देशों के 58,238 प्रतिभागियों के मूड का विश्लेषण किया। इनमें डिप्रेशन पीडि़तों से लेकर अक्सर तनावग्रस्त और हमेशा खुशनुमा महसूस करने वाले लोग शामिल थे। कई चरणों में हुए इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि ज्यादातर लोग रोजमर्रा की पसंदीदा गतिविधियों के जरिये नकारात्मक ख्यालों को दूर करने की कोशिश करते हैं। पसंदीदा गतिविधियों के जरिये मूड नियंत्रित करने की यह प्रक्रिया ‘मूड होमियोस्टैसिस कहलाती है। मुख्य शोधकर्ता प्रोफेसर गाय गुडविन के मुताबिक ज्यादातर समय तनाव से घिरे रहने वाले लोगों में ‘मूड होमियोस्टैसिस की प्रक्रिया बेहद धीमी होती है। वहीं, डिप्रेशन रोगियों में तो यह पूरी तरह से नदारद मिली। उन्होंने कहा कि जब हम उदास होते हैं तो कुछ ऐसा करते हैं, जिससे हमारे चेहरे पर मुस्कराहट आए। इसी तरह, खुशी का एहसास बढऩे पर हम जाने-अनजाने में ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे देते हैं, जो मूड बिगाड़ सकती हैं। हालांकि, कोरोना लॉकडाउन के बीच पसंदीदा गतिविधियां करने की गुंजाइश बेहद कम है। इससे नकारात्मक विचारों के मन में घर कर जाने और व्यक्ति के डिप्रेशन की चपेट में आने का खतरा ज्यादा हो जाता है।

बेहतर इलाज खोजने में मदद मिलेगी

-गुडविन कहते हैं, अध्ययन से साफ है कि डिप्रेशन रोगियों में ‘मूड होमियोस्टैसिस की प्रक्रिया नहीं होती। इससे अवसाद के इलाज में ज्यादा कारगर दवाएं और थेरेपी ईजाद करने में मिलेगी। शोधकर्ता मूड नियंत्रित करने वाली गतिविधियों को प्रेरित कर और मरीजों को इसे अपनाने की ट्रेनिंग देकर उनमें तनाव का स्तर घटाने की विधि तलाश सकेंगे।
दवाओं का असर घटेगा
-20त्न से अधिक लोग जिंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर डिप्रेशन का जरूर सामना करते हैं
-50त्न पीडि़तों को लॉकडाउन में डिप्रेशनरोधी दवाओं, मनोवैज्ञानिक इलाज से नहीं मिलेगी राहत खुशी का अलग-अलग पैमाना
-अमीर मुल्कों में लोगों को सबसे ज्यादा ‘फील गुड व्यायाम और घूमने-फिरने से होता है
-गरीब, विकासशील देशों में धार्मिक गतिविधियों से लोग सर्वाधिक अच्छा महसूस करते हैं।
पसंद पर आधारित इलाज खोजना होगा
-26.4 करोड़ से अधिक लोग दुनियाभर में डिप्रेशन से जूझ रहे, डब्ल्यूएचओ के एक अनुमान के मुताबिक
-80त्न पीडि़त गरीब-विकासशील देशों में, पसंदीदा गतिविधियों पर आधारित इलाज पद्धति ईजाद करनी होगी
अकेलेपन के एहसास से परेशान
-ग्लासगो यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन में शामिल ज्यादातर प्रतिभागियों ने लॉकडाउन में अकेलापन और बंधा-बंधा महसूस होने की शिकायत की
-कई प्रतिभागियों ने मन में खुदकुशी का ख्याल तक आने की बात कही, शोधकर्ताओं ने ऐसे लोगों की पहचान कर तुरंत जरूरी मदद देने की सलाह दी
-यूके एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंस के शोध में भी लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग तनाव, बेचैनी, अवसाद, नकारात्मक विचार बढ़ाने के लिए जिम्मेदार मिले
योग से ‘फील गुड करें
-अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने योग, अध्यात्म और श्वास क्रियाओं को तनाव, चिड़चिड़ाहट, बेचैनी, अकेलेपन की भावना से निजात पाने का सबसे कारगर जरिया बताया
-रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक बताया, कहा-बेचैनी और अवसाद से कीटाणुओं व जीवाणुओं से लडऩे की मानव शरीर की क्षमता कमजोर पड़ती चली जाती है

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