जयपुर का इंडिया प्रोटेक्शन कोशेंट 33 के स्कोर के साथ राष्ट्रीय औसत से भी कम

जयपुर, 20 जून (एजेन्सी)। देश की निजी क्षेत्र की प्रमुख जीवन बीमा कंपनियों में से एक मैक्स लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (”मैक्स लाइफ/कंपनी) ने आज बताया कि जयपुर में सिर्फ 47 फीसदी लोगों के पास जीवन बीमा है जो इसे देश के सबसे कम बीमित शहरों में से एक बनाता है। कांतार आईएमआरबी के साथ मिलकर मैक्स लाइफ द्वारा कराए गए ”इंडिया प्रोटेक्शन कोशेंट सर्वे के मुताबिक जयपुर का प्रोटेक्शन कोशेंट 100 में से 33 रहा जो शहरी भारत के राष्ट्रीय औसत 35 से कम है। यह त्रिआयामी सर्वेक्षण जीवन बीमा और टर्म इंश्योरेंस के प्रति जागरूकता, खरीदारी, उनके डर, पसंद और पॉलिसी खरीदने के पीछे के प्रोत्साहन का अध्ययन कर पॉलिसीधारकों की भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए वित्तीय तैयारी का स्तर जांचता है। वी. विश्वानंद, उप प्रबंध निदेशक, मैक्स लाइफ ने कहा: ”इंडिया प्रोटेक्शन कोशेंट सर्वे से पता चला कि जीवन बीमा और टर्म इंश्योरेंस जागरूकता व खरीदने के मामले में जयपुर की रैंकिंग काफी कम है। विरासत में मिली जमीनों और कारोबार के दम पर मजबूत पृष्ठभूमि की वजह से लोगों में वित्तीय सुरक्षा की भावना है। इसी वजह से लंबी अवधि की वित्तीय बचत और सुरक्षा उत्पादों में निवेश कम है। वित्तीय प्रगति जीवन बीमा पॉलिसी की खरीदारी में परिवर्तित नहीं हुई जिससे उनके प्रियजनों को वित्तीय सुरक्षा मिल सके। प्रीमियम को परिवार के वित्तीय भविष्य की सुरक्षा के लिए किए गए निवेश के बजाय अतिरिक्त खर्च माना जाता है। इस सर्वे के परिणाम वित्तीय रूप से सुरक्षित परिवार और देश बनाने के लिए उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए शुरूआती बिंदु के तौर पर काम कर सकते हैं। जहां शहरी भारत का प्रोटेक्शन कोशेंट (0-100 के स्केल पर भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर सुरक्षित और मानसिक तैयारी महसूस करने का स्तर) 35 पर रहा वहीं, उत्तर भारत का प्रोटेक्शन कोशेंट भी समान स्तर पर रहा। जयपुर का प्रोटेक्शन कोशेंट 33 रहा जो अहमदाबाद, भुवनेश्वर, लखनऊ और विशाखापत्तनम जैसे अन्य टियर 1 शहरों के मुकाबले इसकी रैंकिंग कम करता है।इसके अलावा 39 के नॉलेज इंडेक्स स्कोर के साथ एक श्रेणी के तौर पर बीमा के प्रति जयपुर की जागरूकता का स्तर देश के स्कोर के बराबर पाया गया। जीवन बीमा खरीदने के 65 फीसदी राष्ट्रीय औसत के मुकाबले सर्वे में पाया गया उत्तर भारत में पूर्वी भारत (72 फीसदी और 24 फीसदी), दक्षिण भारत (74 फीसदी और 24 फीसदी) और राष्ट्रीय स्तर पर देश के (65 फीसदी और 21 फीसदी) के मुकाबले जीवन बीमा और टर्म इंश्योरेंस (59 फीसदी और 22 फीसदी) खरीदने की दर कम है। उत्तर भारत में पश्चिम भारत (57 फीसदी और 16 फीसदी) के मुकाबले जीवन बीमा और टर्म इंश्योरेंस खरीदने की दर अधिक है। जयपुर के 47 फीसदी प्रतिभागियों के पास जीवन बीमा है जो देश में सबसे कम स्तर है। चंूकि शहर से सर्वे में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों की संख्या महज 10 फीसदी है, ऐसे में शहर जीवन की अनिश्चितताओं की वजह से सामने आने वाली वित्तीय अस्थिरता का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। टर्म इंश्योरेंस के प्रति जागरूकता भी 44 फीसदी के निचले स्तर पर है जबकि शहरी भारत की जागरूकता का स्तर 47 फीसदी पर है, जो चिंता की वजह है। जीवन बीमा लेने वालों की अपेक्षाकृत कम संख्या के साथ 38 फीसदी उत्तर भारत का मानना है कि गंभीर बीमारी होने पर उनकी बचत एक वर्ष से अधिक समय तक नहीं चलेगी। 14 फीसदी प्रतिभागियों का मानना है कि अगर उन्हें कोई गंभीर बीमारी हो जाए तो आर्थिक रूप से मदद करने वाला कोई नहीं होगा। सिर्फ 8 फीसदी प्रतिभागियों ने माना है कि गंभीर बीमारी परिवार के लिए नुकसानदायक हो सकती है जबकि 52 फीसदी प्रतिभागियों ने इसके बारे में सोचा तक नहीं। जयपुर के 36 फीसदी प्रतिभागियों का मानना है कि गंभीर बीमारी होने पर उनकी बचत एक वर्ष से भी कम समय तक चलेगी और 31 फीसदी का मानना है कि कमाई करने वाले व्यक्ति की मृत्यु होने पर उनकी बचत एक वर्ष से अधिक समय तक नहीं चलेगी। शहर के 14 फीसदी प्रतिभागियों का मानना है कि गंभीर बीमारी या मृत्यु होने पर उनकी मदद करने वाला कोई नहीं है। शहरी भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में जीवन बीमा और टर्म इंश्योरेंस खरीदने की दर कम है। शहरी भारत में 59 फीसदी महिलाओं तो 68 फीसदी पुरुषों के पास जीवन बीमा पॉलिसी है और 22 फीसदी पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 19 फीसदी महिलाओं के पास टर्म इंश्योरेंस है। सर्वे में यह भी पाया गया कि उत्तर भारत में पुरुषों और महिलाओं के बीच जीवन बीमा का भारी अंतर है। 60 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 56 फीसदी महिलाओं के पास जीवन बीमा है। वहीं क्षेत्र में 16 फीसदी महिलाओं के पास टर्म इंश्योरेंस है जबकि 24 फीसदी पुरुषों के पास टर्म प्लान है।ठीक इसी तरह उत्तर भारत में महिलाओं की कमाई का 40 फीसदी हिस्सा मूलभूत खर्चों में जाता है, जबकि पुरुष अपनी कमाई का 37 फीसदी हिस्सा मूलभूत चीज़ों में खर्च करते हैं जिससे बचत और निवेश में महिलाओं द्वारा किया जाने वाला खर्च भी पुरुषों के मुकाबले कम हो जाता है।

 

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