साइरस मिस्त्री को बाहर करने का फैसला सुखद नहीं था- रतन टाटा

नई दिल्ली। टाटा ग्रुप के पूर्व चैयरमैन रतन टाटा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि साइरस मिस्त्री को बाहर करने का निर्णय सुखद नहीं था, लेकिन उसमें टाटा ग्रुप कि गरिमा के अनुरूप गुणों की कमी थी। रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के कानूनी दांव-पेच के बीच यह एक नया मोड़ आया है। टाटा ने अपने प्रतिउत्तर में साइरस मिस्त्री को ट्रोजन हॉर्स कहते हुए कहा कि उसके द्वारा किया गया कार्य और लगाए गए आरोप मर्यादाहीन हैं।टाटा ने अपने नवीनतम हलफनामे में कहा, मैं विनम्रता के साथ यह कहता हूं कि यदि यह मामला मेरे प्रदर्शन का मूल्यांकन है और मैंने अपने कार्यकाल के दौरान टाटा समूह के लिए क्या किया है, तो यह दूसरों को तय करना है। मैं सम्मानपूर्वक इस तरह की बहस से बचूंगा। अपने जीवन के इस पड़ाव में, मैं अपने प्रदर्शन का समर्थन या बचाव नहीं करना चाहूंगा। इससे पहले टाटा संस द्वारा राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के 18 दिसंबर के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती देने के एक दिन बाद टाटा संस के पूर्व प्रमुख सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। अक्टूबर 2016 में टाटा संस के अध्यक्ष के रूप में मिस्त्री को बर्खास्त किए जाने के बाद टाटा समूह और शापूरजी पल्लोनजी समूह अपनी दो निवेश फर्मों के माध्यम से एक लंबी कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं।18 दिसंबर 2019 को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल ने साइरस को आरोपों से मुक्त करते हुए उनके पक्ष में फैसला दिया। ट्रिब्यूनल ने उन्हें फिर से टाटा सन्स का चेयरमैन नियुक्त करने का आदेश दिया था। इसके बाद टाटा संस ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.बता दें रतन टाटा के रिटायर होने के बाद साइरस मिस्त्री 2012 में टाटा संस के छठे चेयरमैन बने। उनको अक्टूबर 2016 में उनके पद से हटा दिया गया था। इसके बाद टीसीएस के प्रबंध निदेशक और सीईओ एन चंद्रशेखरन को टाटा संस का नया चेयरमैन बनाया गया। दो महीने बाद मिस्त्री की ओर से उनके परिवार की दो इन्वेस्टमेंट कंपनियों- साइरस इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड और स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्प ने टाटा सन्स के फैसले को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की मुंबई बेंच में चुनौती दी थी। दलील थी कि मिस्त्री को हटाने का फैसला कंपनीज एक्ट के नियमों के मुताबिक नहीं था।

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