तनाव बढ़ाने के साथ खुदकुशी के तरीके भी बता रहा Social Media

सोशल मीडिया खुदकुशी को दोहरे स्तर पर बढ़ा रहा है। पहले तो यह लोगों का तनाव बढ़ाता है जिससे लोग आत्महत्या के बारे में सोचने लगते हैं। दूसरा लोग यहीं से सूइसाइड के नए-नए तरीके ढूंढते हैं। फिर उन तरीकों का इस्तेमाल कर जान देते हैं।छोटे-बड़े हर उम्र के लोगों के लिए सोशल मीडिया जिंदगी का हिस्सा बन गया है। लेकिन दूर बैठे लोगों से कम्यूनिकेट करने का यह माध्यम अब सूइसाइड को बढ़ावा देने में भी पीछे नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि सोशल मीडिया खुदकुशी को दोहरे स्तर पर बढ़ा रहा है। पहली वजह ये है कि सोशल मीडिया की वजह से लोगों का तनाव काफी बढ़ जाता है जिससे लोग आत्महत्या के बारे में सोचने लगते हैं। दूसरा यह कि लोग यहीं से सूइसाइड के नए-नए तरीके ढूंढते हैं। फिर उन तरीकों का इस्तेमाल अपनी जान देने में करते हैं।
खुदकुशी की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की जरूरत -एम्स के डॉक्टर का कहना है कि हमें सोशल मीडिया के इस्तेमाल और इससे पैदा होनेवाली खुदकुशी की प्रवृत्ति के रोकथाम पर काम करने की जरूरत है। सूइसाइड को रोकने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के तौर पर करने की जरूरत है, ताकि समय पर ऐसे लोगों के बारे में पता कर सकें। उनकी काउंसलिंग करके उनकी जान बचा सकें। एम्स के फोरेंसिक विभाग के डॉक्टर चितरंजन बेहरा ने बताया कि देश की 1 लाख आबादी में 10 लोग सूइसाइड करते हैं। सोशल मीडिया की लत स्ट्रेस में धकेल रही -दिल्ली की बात करें तो अकेले एम्स में हर साल औसतन 500 से 600 सूइसाइड के मामले आते हैं। उन्होंने कहा कि सबसे चिंता की बात यह है कि अधिकांश सूइसाइड के मामले 20 से 40 साल की उम्र के लोग होते हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया इसका बहुत बड़ा कारण बनता जा रहा है। इसकी लत लोगों को स्ट्रेस में धकेल देता है। इसलिए हमें सोशल मीडिया की वजह से बढ़ते सूइसाइड के मामलों को रोकने पर काम करना होगा। डॉक्टर बेहरा ने कहा कि हमारे पास खुदकुशी को रोकने के लिए कोई प्लान नहीं है। जबकि चीन के बाद पूरे विश्व में सबसे ज्यादा सूइसाइड भारत में होता है। पहले लोग जहर का इस्तेमाल करते थे। अब ज्यादातर मामले में फांसी लगा लेते हैं। इसके अलावा भी कई नए-नए तरीके खुदकुशी के लिए अपनाए जा रहे हैं।
डिजिटल सूइसाइड नोट को पढऩा होगा –डॉक्टर चितरंजन बेहरा ने बताया कि सोशल मीडिया पर व्यस्त रहने वाले लोग जब स्ट्रेस का शिकार होते हैं तो वो सबसे पहले यहीं पर अपने मन की बात करते हैं। अचानक उनका अपडेट पहले की तुलना में बदला नजर आता है। ऐसे लोगों का ट्विटर पर अपडेट, फेसबुक पर कमेंट्स एक तरह से इलेक्ट्रॉनिक सूइसाइड नोट की तरह है। लोग अपनी तकलीफ यहां पर शेयर करते हैं। लेकिन अभी हम और आप इस पर कुछ नहीं कर पाते हैं। यहां ऐसे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की जरूरत है, जो सोशल मीडिया पर नजर रखे और तुरंत ऐक्टिव हो, ताकि ऐसे लोगों की पहचान कर उनकी काउंसलिंग की जा सके।  परिवार में अगर किसी ने सूइसाइड किया है तो -डॉक्टर चितरंजन बेहरा ने कहा कि कई प्रकार की स्टडी चल रही है, जिसमें एक जेनेटिक रिसर्च भी है। एक ही वातावरण, एक ही जीने के तरीके, एक ही तरह की आर्थिक स्थिति के बावजूद एक शख्स सूइसाइड कर लेता है, दूसरा नहीं करता। कहीं न कहीं बढ़ता तनाव इंसान के अंदर बायोलॉजिकल बदलाव पैदा कर देता है। इसलिए हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि परिवार में अगर किसी ने सूइसाइड किया है तो उसके आगे की पीढ़ी में सूइसाइड करने की प्रवृत्ति कितनी है। उन्होंने कहा कि लगभग 40 पर्सेंट तक खतरा है कि उनकी आगे की पीढ़ी में भी सूइसाइड की प्रवृत्ति हो।
केस स्टडी 1
12 साल की एक बच्ची टीवी पर एक सीरियल अक्सर देखती थी। यह उसके रूटीन में शामिल था। एक दिन उसने सीरियल में देखा कि एक प्रेमी जोड़ा है, जो सूइसाइड कर लेता है और उन दोनों का पुनर्जन्म हो जाता है। बच्ची इससे इतनी प्रभावित हो गई कि उसने पुनर्जन्म को सही मान लिया और खुद सूइसाइड कर लिया।
केस स्टडी 2
12 साल का बच्चा हमेशा मोबाइल पर बिजी रहता था। उसके पैरंट्स को उसकी यह आदत बहुत बुरी लगती थी। एक दिन उसके पैरंट्स ने मोबाइल छीन लिया तो बच्चे ने गुस्से में आकर सूइसाइड कर लिया।
सूइसाइड का बढ़ता ग्राफ
– एम्स में हर साल औसतन 1700 से 1800 मामले पोस्टमार्टम के लिए आते हैं, जिसमें से एक तिहाई मामले सूइसाइड के होते हैं
– अभी भी अधिकांश सूइसाइड के मामले घरेलू हैं, जिसमें इपल्सिव (आवेग में आकर) लोग सूइसाइड कर लेते हैं
– संकेत हैं कि जिनके परिवार में सूइसाइड हुए हैं, उनके आगे की पीढ़ी में इसका 40 पर्सेंट खतरा है

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *