राज्य सरकार की उपेक्षा के शिकार निजी अस्पताल कोविड-19 में सेवाएँ देने में असमर्थ

डॉ. प्रहलाद गुप्ता

आज जहां पूरा विश्व कोविड-19 जैसी महामारी से त्रस्त है और सभी देश इसका डट कर मुक़ाबला करने के लिए कमर कसे हुए है, भारत में भी सरकारी और निजी अस्पताल इस समस्या से निपटने के लिए कंधे से कंधा मिला कर तैयार हो चुके है, कोरोना से निपटने के लिए राज्य सरकार ने निजी अस्पतालों को अधिग्रहीत करना प्रारम्भ कर दिया है और इस बीमारी को भी महात्मा गांधी आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना में जोड़ दिया गया है ताकि इस बीमारी से ग्रस्त मरीज निजी अस्पतालों में भी नि:शुल्क उपचार का लाभ ले सकें। निजी अस्पताल इस बीमारी के खिलाफ युद्ध में सरकार के साझेदार बन कर एक योद्धा की तरह लड़ रहे है किन्तु ये योद्धा आज राज्य सरकार की लचर व्यवस्थाओं और अफसरशाही का शिकार हो कर ऐसी परिस्थिति में आ गए है की उनके अस्तित्व पर ही संकट आ गया है। जिस योजना के नाम पर सरकार मरीजों को निजी अस्पतालों में नि:शुल्क उपचार मिलने का दावा कर रही है वही योजना बुरी तरह जंग खा चुकी है और इस स्थिति को सुधारणा सरकार के गले की फांस है, इसके लिए नियुक्त अधिकारी पिछले एक साल से फाइलों को एक दूसरे पर दाल कर अपनी बला छुड़ाने का प्रयास कर रहे है।
प्रदेश मे भले हो केंद्र और राज्य सरकार की अत्यंत महत्वकांक्षी योजना भली भांति चलती हुई प्रतीत होती हो किन्तु सत्य इसके उलट है। योजना के सबसे बड़े भागीदार निजी अस्पताल सरकारी उपेक्षा और अनदेखी के शिकार हो कर आर्थिक रूप से प्रताडि़त हो रहे है और उनके सामने अभी कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी को झेलने और निजी अस्पतालों मे कार्यरत हजारों कर्मचारियों को वेतन देने में असहाय महसूस कर रहे है और अब उनके सामने अस्पतालों को बंद करने का संकट बना हुआ है। निजी अस्पताल असोशिएशन इसके लिए लगातार सरकार और बीमा कंपनी के आधिकारियों और यहाँ तक की चिकित्सामंत्री तक को ज्ञापन दे चुके है किन्तु उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है ।
वर्तमान हालात: पूर्ववर्ती बेजेपी सरकार ने वाहवाही लूटने के इरादे से योजना तो शुरू कर दी किन्तु इसका मूल स्तम्भ जो की निजी अस्पताल थे उनको ऐसी परिस्थिति में दाल दिया है की वे अनाथ महसूस कर रहे है और वर्तमान सरकार शायद इसलिए इस पर ध्यान नहीं दे रही है क्यों की ये उनकी योजना नहीं है और वे केवल नि:शुल्क दवा और जांच योजना पर फोकस किए हुए है ।
योजना में निजी अस्पतालों ने पिछले चार सालों तक जी जान से काम किया किन्तु आज उन्हे उसी काम के बदले दर दर भटकें को मजबूर होना पड रहा है और इनके सामने योजना में काम बंद करने के साथ साथ अस्पतालों को ही बंद करने की स्थिति आ गयी है । निजी अस्पताल यदि काम करना बंद कर देते है तो इस से सरकारी अस्पतालों पर भारी दबाव पडऩे की संभावना है क्योंकि निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज नहीं मिलने की वजह से वह सभी मरीज जो लाभार्थी हैं, या जरूरतमंद है वे सरकारी अस्पतालों की तरफ रुख करेंगे और पहले से ओवरलोडेड और कोरोना वार्डों मे तब्दील सरकारी अस्पतालों में जहां पहले से ही मूलभूत संसाधनों और आवश्यक स्टाफ का भी अभाव है इतने मरीजों के लिए पर्याप्त चिकित्सक, नर्सिंग स्टाफ, दवाइयां, जांचें, ऑपरेशन, बेड, इत्यादि जुटाना गले की फांसी बन जाएगा ।
A .आज की तारीख मे निजी अस्पतालों का विभिन्न चरणों में 300 करोड़ से अधिक का भुगतान लंबित है जो की एक मामूली राशि नहीं है ।
B . इसमें से लगभग 180 करोड़ तो पास किए गए क्लैम का भुगतान है और शेष रेजेकटेड या अपीलों मे अटका हुआ पैसा है ।
C. बीमा कंपनी के पास पिछले वित्तीय वर्ष अर्थात 2019-20 के 31 मार्च 2020 तक सभी अस्पतालों के बकाया भुगतान की अंतिम मोहलत सरकार द्वारा तय की गयी थी किन्तु बीमा कंपनी की जूं भी नहीं रेंगी ।
D.वादे के मुताबिक राज्य सरकार को बीमा कंपनी के भुगतान मे असफल रहने पर प्रीमियम से काटी गयी security amount मे से जो की लगभग 100 करोड़ के आस पास की धनराशि थी मे से निजी अस्पतालों के बकायात चुकाने थे किन्तु सरकार ने भी इसे महज एक तारीख की तरह भुला दिया । मतलब ना तो बीमा कंपनी और ना ही सरकार ये राशि का भुगतान करने की मंशा रखती है संभवतया जि़म्मेदारी कौन लेवे और इसका बीड़ा कौन उठाए ये कारण हो सकता है या लाखों की संख्या मे अपीलें और शिकायतों का बाकी रहना इसका मुख्य कारण हो सकता है जिसका दारोमदार केवल सरकार के उपर ही है ।
E. इसका मुख्य कारण ये की सरकार ने योजना मे बनाई गयी कमेटियों मे से अपीलीय प्राधिकरण के निर्णयों की अनुपालना अनिवार्य की थी किन्तु बीमा कंपनी ने अधिकतम निर्णयों की धज्जियां उड़ाई और सरकार आँख मूँदे बैठी रही और जो हो रहा था वो होने दिया ।
F.  मतलब सरकार अपने स्वयम के निर्णयों और नियमों की अनुपालना करवाने मे असफल रही और बीमा कंपनी ने इसका भरपूर फाइदा उठाया और अपने लाभ के ग्राफ को खूब उठाया ।
G. इन सब के चलते निजी अस्पतालों की शिकायतों, अपीलों और लंबित सुनवाइयों के साथ साथ लंबित क्लैम का आंकड़ा हजारों से लाखों मे चला गया, निजी अस्पताल आर्थिक और मानसिक प्रताडऩा के शिकार होने लगे ।
H. आज ये निपटारा करना राज्य सरकार के गले की हड्डी बन चुका है, ना वे इसे निगल सकते है और ना ही उगल सकते है ।
I. निजी अस्पतालों मे लगभग 30,000 से अधिक नर्स, 40,000 से अधिक अन्य स्टाफ के अलावा 10,000 से अधिक अन्य सप्लाइ करने वाले या निर्माण की एजेंसियाँ जुड़ी हुई है, कोरोना महामारी के संकट मे इन सबके परिवारों के चलाने पर संकट उत्पन्न हो गया है ।
J. एक ओर जहां सरकारें अन्य क्षेत्रों जैसे रियल इस्टेट, होटल, कपड़ा, शराब इत्यादि उधयोगों पर ध्यान दे रही है तो निजी अस्पताल उपेक्षा का शिकार क्यों हो रहे है ।
K. यदि सरकारी अस्पताल कोरोना अस्पतालों मे तब्दील हो रहे है और निजी अस्पताल भी यदि बंद हो जाते है तो अन्य बीमारियों जैसे डीलीवरी, हृदय रोग, किडनी रोग, हड्डी रोग इत्यादि मरीज कहाँ जाएंगे ये विचारणीय विषय है, आखिर सरकार की बेरुखी इतने बड़े सैक्टर पर क्यों है, इसका क्या कारण हो सकता है ।
L.  यदि ऐसा होता है तो आज महामारी की स्थिति मे स्वास्थ्य योद्धाओं, उन नर्सों के परिवार भूखे सोएँगे क्या सरकार को ये बर्दाश्त है ।
M. कोरोना महामारी के इस विश्व व्यापी संकट में जहां निजी अस्पतालों ने अपने खून पसीने की कमाई से बनाए गए अस्पतालों को अधिग्रहण के लिए प्रस्तुत किया हुआ है, शायद ही किसी उद्धयोग ने इतने बड़े बलिदान के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया हो ।
N. निजी अस्पताल सरकार से केवल अपना हक़ मांग रहे है, कोई आर्थिक सहायता या याचना नहीं कर रहे, जो कानूनन जायज और अधिकार का पैसा है वो मांग रहे है, निश्चित रूप से सरकार यदि इस पर ध्यान नहीं देती है तो इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते है

ऐसा क्यों हुआ:

1. ये है कि पिछले लगभग 12 माह से बीमा कंपनी भुगतान में अनियमितता दिखाई और वे अवसरवादी रही है।
2. बीच मे 3 से 4 माह से ष्टश्वह्र के पद पर कोई स्थायी अधिकारी नहीं बैठा और ना ही छ्वष्टश्वह्र के पद पर कोई अधिकारी लंबे समय तक तिक पाया इसका फायदा उठाते हुए बीमा कंपनी ने भुगतान धीमा करते हुए क्लेम रिजेक्शन की मात्रा बढ़ा दी ताकि यदि अस्पताल अपील कर भी तो उसकी सुनवाई ना हो।
3. ऐसा ही हुआ और अब तक 80000 से अधिक अपील लम्बित है और इतनी बड़ी संख्या में अपीलों को देख कर स्टेट हेल्थ एश्योरेन्स एजेंसी स्वयम भी असमंजस मे है की क्या करे और अधिकारियों के सामने टालमटोल की स्थिति उत्पन्न हो गयी है क्यों की अब सरकार के सामने शिकायतों का एक पहाड़ सा खड़ा हो गया है ।
4. उन्होंने अपीलों को निस्तारण के लिये जिलों में नोडल अधिकारियों के पास भेजना शुरू कर दिया ये जानते हुए की इस से समाधान में और भी अधिक देरी हो जाएगी।
5. बीमा कंपनी ने राज्य सरकार Reopen and Pay के निर्णय वाले अधिकतम केसों को बिना भुगतान के सीधे 2ठ्ठस्र अपील में डाल दिया ताकि उनका भुगतान भी रोका जा सके, और ये पैंतरा भी उनका सही पड़ा, ऐसा ही हुआ, यहाँ भी सरकार उनकी चाल को समझ नहीं पायी और निजी अस्पतालों को लूटेरा मानते हुए जिम्मेदार अधिकारी उनके मसलों को नजऱअंदाज़ करते रहे ।
6. राज्य सरकार ने सभी बिलों के निस्तारण के लिए कुछ सिक्योरिटी राशि प्रीमियम से रोकी थी ताकि पालिसी की समाप्ति पर मसलों का निस्तारण आसानी से किया जा सके, बीमा कंपनी इसे भांप गयी और उस पैसे को निकलवाने के लिए प्रयास करने लगी, किन्तु आज भी सरकार की हिम्मत उस पैसे को जारी करने की नहीं हो रही है ।
7. राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए बीमा कंपनी ने निजी अस्पतालों को मानसिक और आर्थिक तौर ओर प्रताडि़त करना शुरू कर दिया।
8. दुखी निजी अस्पतालों ने अपने स्तर पर बीमा कंपनी ओर स्वास्थ्य भवन के चक्कर लगाना शुरू कर दिया किंतु उन्हें हर जगह से निराशा हाथ लगी।
9. सभी निजी अस्पतालों ने एकजुट होकर स्वास्थ्य भवन पर जाकर संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी से, इसके बाद मुख्य कार्यकारी अधिकारी से और अतिरिक्त मुखी सचिव और यहाँ तक की चिकित्सा मंत्री से भी अपनी व्यथा कही किंतु उन्होंने निजी अस्पतालों की मांग को अनसुना कर दिया।
10. सारे रास्ते बंद हो जाने पर निजी अस्पतालों को केवल राज्य सरकार के न्याय पर यकीन था की यहाँ तो जरूर न्याय मिलेगा किन्तु सरकार ने हर निवेदन, पत्रों, ज्ञापनों को अनदेखा किया, निजी अस्पतालों ने सरकार के साथ की गयी मीटिंगों मे अपनी आवाज़ उठाई तो हर बार जल्दी समाधान का हवाला दे कर उनको ताल दिया गया और निजी अस्पताल उनकी बातों पर सरकार को अपना अभिभावक मानते हुए विश्वास किए हुए इंतज़ार करते रहे ।
इतिहास :
– दरअसल इस योजना की शुरुआत बीजेपी के शासनकाल में भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना (BSBY) के नाम से 2015 में हुई थी और BPL, नरेगाकर्मी, तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े परिवारों को इस योजना का लाभ दिया जाना तय हुआ था।
– इसके लिए बीमा कंपनियों से टेंडर मांगे गए।
– न्यू इंडिया एश्योंरेन्स कंपनी ने भी टेंडर भरा और सबसे कम की बोली लगाई ।
– बीमा कंपनी ये टेंडर सबसे कम की बोली की वजह से जीत गयी।
– योजना के संचालन के लिए कमेटियाँ बनाई गयी जिसमें क्रमश: 1. न्यू इंडिया एश्योंरेन्स कंपनी स्वयम, 2. RSHAA(राजस्थान स्टेट हैल्थ एश्योंरेन्स एजेंसी), 3. प्रिन्सिपल हैल्थ सेक्रेटरी (PHS) और यदि आवश्यकता पड़े तो 4 . Arbitration और अंतिम 5. माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय
– इसमें क्रमश: अस्पतालों को योजना से सम्बद्ध/ असम्बद्ध करने के मापदण्ड का निर्धारण, Claims  का निर्धारण, भुगतान की प्रक्रिया, शिकायतों/ अपीलों का निस्तारण इत्यादि से संबन्धित नियम बनाए गए।
– 12 दिसम्बर 2015 से योजना का विधिवत संचालन प्रारम्भ हुआ और निजी अस्पतालों ने क्लैम करने शुरू किए।
– चूंकि एश्योंरेन्स कंपनी ने सबसे कम राशि का टेंडर भरा था तो अब उसे नुकसान होने लगा, कंपनी को नुकसान की भरपाई की चिंता हुई ।
– इसके तीन ही रास्ते थे पहला: अस्पताल को क्लैम करने की स्थिति मे ही ना रखा जाए मतलब येन केन प्रकारें योजना से हटा दिया जाये, दूसरा: अस्पतालों के क्लैम के भुगतान को विभिन्न प्रक्रियाओं मे अटका दिया जाए, तीसरा: अस्पतालों की शिकायतें कर कर के उन्हें बनाई गयी पांचों कमेटियों के चक्कर में लंबे समय के लिए फंसा दिया जाये।
– इन तीनों प्रक्रियाओं के लिए बीमा कंपनी ने पुरजोर कोशिश की और अस्पतालों को विभिन्न अपीलों की लंबी प्रक्रियाओं मे उलझाना शुरू कर दिया ।
– नजीतन अस्पतालों का हक का पैसा बड़ी मात्रा में अटकने लगा, अपीलों की सुनवाई मे आने वाले अस्पतालों की तादाद बढ्ने लगी, लोग बीमा कंपनी और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने लगे ।
– बीमा कंपनी को क्लैम का भुगतान कम से कम करना पड़ा और उनको मुनाफा होने लगा ।
– बीमा कंपनी ने इस रणनीति को पुख्ता बना लिया और इसे बड़े पैमाने पर जारी रखा, इसके लिए टीम बनाई गयी, ये आंकड़े बताते है की उस टीम के मुख्य सदस्यों का योजना के कार्यकाल की अवधि में कभी तबादला नहीं हुआ जबकि इसके उलट राज्य सरकार की कार्यकारिणी का समय समय पर तबादला होता रहा यहाँ तक की इस कार्यकाल में कई बार तो मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO-RSHAA)  का और अति. मुख्य कार्यकारी अधिकारी (JCEO-RSHAA) का पद कई बार खाली रहा।
– बीमा कंपनी ने इसका पुरजोर फाइदा उठाया और क्लैम की अपीलों तथा अस्पतालों की शिकायतों की अपीलों की संख्या लगातार बढ़ती रहे ताकि निजी अस्पताल सरकार के ढुलमुल रवैये के भेंट चढ़ जाये और बीमा कंपनी को सरकार से प्राप्त प्रीमियम से क्लैम का भुगतान ना करना पड़े।
– क्लैम को लटकाने के लिए निर्धारण की कई सीढिय़ाँ बनाई, अपील के दो चरण सरकार से बनवाए ताकि यदि पहले चरण मे सरकार क्लैम पास कर दे तो उसे बिना किसी कारण द्वितीय चरण मे डाल दिया जाए और क्लैम का भुगतान थोड़े और लंबे समय के लिए लटक जाये। यदि एक ऑडिट कराई जाये तो इसका खुलासा हो सकता है।
– अस्पतालों की शिकायतें लेने के लिए फील्ड मे जाने के लिए टीमों का गठन किया गया जो लाभार्थियों के गाँव गाँव जा कर उन्हे निजी अस्पतालों के विरुद्ध बयान देने के लिए उकसाने लगे यहाँ तक की लोगों को रीचार्ज, नकद भुगतान का लालच और कार्ड निरस्त हो जाने का भय भी दिखाया गया। यदि एक ऑडिट कराई जाये तो इसका खुलासा हो सकता है।
– बीमा कंपनी इस कदर निर्दयी बन गई की उन्होने ये भी नहीं सोचा की महज कुछ पैसों की मुनाफे के लिए उन्होने निजी अस्पतालों की छवि एक लूटेरे जैसी बना तो दी किन्तु इस से उन अस्पतालों की सामाजिक प्रतिस्ठा को भयंकर हानी उठानी पड़ती थी और मानसिक और आर्थिक प्रताडऩा को भी झेलना पड़ता था।
– लोगों की 95त्न शिकायतें निजी सुनवाई मे असंतोषप्रद दिखा कर सरकार को अनावश्यक ही भेज दी जाती थी। और वे अस्पताल अपनी सुनवाई में 2 से 3 महीने के लिए योजना मे काम नहीं कर पाते थे इस से बीमा कंपनी को मोटा लाभ होता था।
निजी अस्पतालों का यह मत है कि वर्तमान योजना में तीन ही साझेदार है राज्य सरकार, बीमा कंपनी, एवं निजी अस्पताल एवं लगातार निजी अस्पतालों को इस योजना में उपेक्षित किया गया है उनके उनकी मांगों, जरूरतों, समस्याओं को अनदेखा किया गया है। बीमा कंपनी ने राज्य सरकार द्वारा निर्धारित सभी नियमों की खिल्ली उड़ाते हुए हर नियम का भरपूर तरीके से दुरुपयोग किया और अपने आर्थिक मुनाफे के लिए जायज – नाजायज सभी हथकंडे को अपनाया । राज्य सरकार उनके इरादों को जानते हुए भी आँखें मूँद कर बैठी रही और बीमा कंपनी का समर्थन करती रही और योजना में अपने साझेदार निजी अस्पतालों की समस्याओं की अनदेखी करती रही, हर मोर्चे पर निजी अस्पतालों को पक्षपात का शिकार होना पड़ा और आर्थिक, मानसिक, सामाजिक शोषण का शिकार होना पड़ा । निजी अस्पताल सरकार के दिलासों पर यकीन करते गए और आज हालात इतने खराब हो गए हैं निजी अस्पतालों पर खुद को चलाये रखने का संकट है और अगर निजी अस्पताल बंद हो जाते है तो लाखों मरीजों को आने वाले समय में सरकारी योजनाओं के द्वारा निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज के साथ साथ गुणवत्तापूर्ण इलाज़ के लिए और Super Speciality Treatment  के लिए भटकना पड़ेगा एवं इसके जिम्मेदार कौन होंगे यह तय कर पाना मुश्किल है ।

 

आज जहां पूरा विश्व कोविड-19 जैसी महामारी से त्रस्त है और सभी देश इसका डट कर मुक़ाबला करने के लिए कमर कसे हुए है, भारत में भी सरकारी और निजी अस्पताल इस समस्या से निपटने के लिए कंधे से कंधा मिला कर तैयार हो चुके है, कोरोना से निपटने के लिए राज्य सरकार ने निजी अस्पतालों को अधिग्रहीत करना प्रारम्भ कर दिया है और इस बीमारी को भी महात्मा गांधी आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना में जोड़ दिया गया है ताकि इस बीमारी से ग्रस्त मरीज निजी अस्पतालों में भी नि:शुल्क उपचार का लाभ ले सकें।

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